तारीख पे तारीख ….. तो न्यायाधीश क्या करें?

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
प्रतिदिन देश की अदालतों में लाखों मुकदमें सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होते हैं। अदालतों में मुकदमों की सुनवाई की गति बहुत धीमी दिखाई देती है। गत स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने किसी एक बलात्कार के मुकदमें का संदर्भ प्रस्तुत करते हुए बताया कि बलात्कारियों के विरुद्ध चलने वाले आपराधिक मुकदमें की सुनवाई 5 दिन में पूरी करके उन्हें सजा सुना दी गई। इसी प्रकार के समाचार यदा-कदा सुनने को मिलते रहते हैं। इसका सीधा अभिप्राय है कि किसी भी मुकदमें का निपटारा करने का लक्ष्य यदि न्यायाधीश के द्वारा निर्धारित हो जाये तो वह उस सीमित अवधि में अवश्य ही सफलता प्राप्त कर सकता है। कुछ विशेष मुकदमों में इस प्रकार का लक्ष्य निर्धारित करने वाले न्यायाधीशों को न्याय व्यवस्था का रोल माॅडल मानकर क्या केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें एक ऐसी सर्वमान्य व्यवस्था लागू नहीं कर सकती जिसमें एक महीना न सही, 6 माह या एक वर्ष की अवधि निर्धारित करके प्रत्येक न्यायाधीश के साथ-साथ देशभर के वकीलों को ऐसी शीघ्र न्याय की व्यवस्था के प्रति नतमस्तक होने के लिए मजबूर कर दिया जाये। शीघ्र न्याय की ऐसी व्यवस्था न असम्भव है और न ही कठिन। बड़ी सरलता के साथ इस व्यवस्था को लागू किया जा सकता है।
हमारे देश की अदालतों से निकलने वाला हर व्यक्ति एक ही डायलाॅग बोलकर न्याय व्यवस्था के प्रति अपना असंतोष व्यक्त करता दिखाई देता है। जब भी किसी व्यक्ति से पूछो, ‘क्या हुआ तुम्हारे मुकदमें का?’ जवाब मिलता है, ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख।’ कई बार तो अन्तिम सुनवाई के लिए निर्धारित मुकदमों में भी किसी छोटे-मोटे कारण को आधार बनाकर तारीखें बढ़ती चली जाती हैं। ऐसे में जनता को सबसे बड़ा दोषी सामने बैठा न्यायाधीश ही दिखाई देता है। परन्तु गम्भीरता से सोचने का प्रश्न है कि क्या केवल एक न्यायाधीश अर्थात् देश के सभी न्यायाधीश न्याय व्यवस्था को जानबूझकर धीमी गति से चलाने के दोषी हैं? मेरा स्पष्ट उत्तर है कि दोष केवल न्यायाधीशों का नहीं अपितु वकीलों और यहाँ तक कि निरर्थक मुकदमें अदालतों में प्रस्तुत करने वाली जनता सहित केन्द्र और राज्य सरकारों का भी है। यह वास्तविकता है कि हमारे देश में न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धान्तों को देश के एक-एक नागरिक के मन में स्थापित करने का कभी भी कोई प्रयास नहीं किया गया। यदि न्याय के सिद्धान्त देश के एक-एक नागरिक के मन में स्थापित होते तो झूठे मुकदमें और किसी के विरुद्ध किये गये सच्चे मुकदमें में झूठे तर्क अदालतों के सामने प्रस्तुत करके मुकदमों की इतनी बड़ी संख्या इकट्ठी ही न होती। न्याय के सिद्धान्तों में सबसे पहला स्थान है सच्चाई का। यदि देश के नागरिकों को सच्चाई का पाठ पढ़ाना जारी रखा जाता तो शायद न्याय व्यवस्था के नाम पर इतना बड़ा कुंआ न दिखाई देता जिसमें वादी और प्रतिवादी दोनों कूद-कूद कर लहु-लुहान हो रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं। मुकदमें करना और अपने विरुद्ध मुकदमों को झेलना किसी भयंकर तनाव से कम नहीं है। सच्चाई पर चलने वाले नागरिकों का देश कभी भी इतनी लम्बी चैड़ी न्याय व्यवस्था की माँग ही न करता।
परन्तु आज हम अपने असत्य आचरण, लूट-खसोट और अपने अधिकारों के नाम पर दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करने की दौड़ में खुद ही न्याय व्यवस्था को एक तनाव व्यवस्था का रूप दे चुके हैं और दोष देते हैं न्यायाधीशों को। क्या किसी ने कभी सोचा है कि न्यायाधीश की दिनचर्या क्या होती है? एक आम सरकारी अधिकारी या क्लर्क की तरह वह केवल 10 से 5 की नौकरी नहीं करता। देश की अदालतों में यह आमतौर पर देखा जा सकता है कि न्यायाधीश के सामने 50-60 और कभी-कभी 100 मुकदमों की सूची प्रस्तुत होती है। 10 से 5 बजे तक के समय में एक घण्टा भोजन अवकाश का निकाल दें तो 6 घण्टे में न्यायाधीश से यह आशा की जाती है कि वह प्रत्येक मुकदमें की फाइल के एक-एक पृष्ठ को पढ़कर तथ्यों को ध्यान में रखे और शीघ्र सुनवाई के प्रयास करे। इन्हीं 6 घण्टों में क्या उससे यह भी आशा की जा सकती है कि वह 5-10 पृष्ठों से लेकर कभी-कभी 100 पृष्ठों तक फैले निर्णय भी लिखवाये। स्वाभाविक है कि किसी भी न्यायाधीश से इतने विशाल कार्य बोझ को झेलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को तो कई बार सायं 7-8 बजे के बाद तक भी कार्य करते हुए देखा जा सकता है। इसके बावजूद अगले दिन की सूचीबद्ध फाइलें उनके साथ ही उनके निवास पर पहुँच जाती हैं। न्यायाधीश को बीते दिन के कार्य बोझ से मुक्ति का श्वांस भी नहीं मिला कि उसके सामने रात्रि में अगले दिन की सूचीबद्ध फाइलें प्रस्तुत हो जाती हैं। क्या किसी न्यायाधीश से यह आशा की जा सकती है कि वह अपने आपको मानव न समझकर केवल एक मशीन की तरह कार्य करता रहे। अपने व्यक्तिगत जीवन और यहाँ तक अपने परिवार और मित्रजनों आदि के साथ भावनात्मक आदान-प्रदान के लिए कुछ समय निकाले बिना केवल अपने आपको न्याय की मशीन सिद्ध करता जाये। पूरा दिन न्यायालय की व्यस्तता के बाद अगले दिन का कार्य बोझ उसे रात्रि में सुख की नींद कैसे देता होगा। प्रातः उठते ही वह अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की तैयारी करे या न करे, उसे सूचीबद्ध फाइलों का स्मरण अवश्य आता होगा। घर पर भी बिताया हुआ एक-एक पल उसके लिए न्याय व्यवस्था के चिन्तन में ही बीतता होगा। ऐसी अवस्था में अगले दिन फिर वही न्यायाधीश अदालत में आकर एक मशीन की तरह बैठा हुआ दिखाई देता है। ऐसे न्यायाधीशों से कैसे आशा की जा सकती है कि वे वकीलों और पक्षकारों को सच्चाई का पाठ पढ़ायें और एक-एक मुकदमें की गम्भीर सुनवाई करके जल्दी से जल्दी निर्णय पर पहुँचने का प्रयास करें। इसलिए न्यायाधीश यदि ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख’ देते चले जा रहे हैं तो इसमें उनका कोई दोष नजर नहीं आता। दोष तो विशुद्ध रूप से देश के वकीलों, पक्षकार नागरिकों और सरकारों का है। फिर भी सारे देश की न्याय व्यवस्था के लिए यदि मुकदमों में तारीखें देने की एक समान ऐसा नियम बना दिया जाये कि किसी भी कार्य के लिए 15 दिन से अधिक की तारीख न दी जाये। बिना किसी आधार के एक बार तो निःशुल्क अवसर दे दिया जाये परन्तु दूसरी बार तारीख मांगने वाले व्यक्ति पर भारी जुर्माना लगाया जाये, तीसरी बार जुर्माने की राशि दोगुनी कर दी जाये और चैथी बार उसका अधिकार समाप्त करके मुकदमा आगे बढ़ा दिया जाये। ऐसे नियम के लागू होने पर यदि कोई व्यक्ति किसी एक कार्य के लिए चार बार तारीख ले भी लेता है तो अधिकतम दो महीने ही तो खराब होंगे। ऐसे नियम के अभाव में अदालतें एक ही बार में दो-तीन महीने की तारीख लगा देती हैं। इसके चलते यदि कोई वकील तीन या चार तारीखें माँग ले तो एक साल की अवधि पार हो जाती है। इस प्रकार यदि प्रत्येक अवस्था में एक-एक, दो-दो साल बीतते जायें तो पूरे मुकदमें के निपटारे में 5 से 10 वर्ष लग ही जाते हैं। मुकदमों की लम्बी अवधि से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि प्रत्येक अवस्था में 15 दिन से अधिक की तारीख न लगाई जाये।
वकील और पक्षकार नागरिक यदि सच्चाई के साथ अपने अधिकारों, कत्र्तव्यों पर चिन्तन-मनन करें और उस वस्तुस्थिति से न्यायालय को अवगत करा दें तो अल्पअवधि में ही करोड़ों मुकदमें निपटते हुए दिखाई देंगे। सरकारों का दोष यह है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को न्याय पालिका के कार्य संचालन के बजट में भी वृद्धि करनी ही होगी। हमारे देश में वर्ष 2016 के बजट में न्याय व्यवस्था के लिए 0.2 प्रतिशत राशि आबंटित की गई थी। निःसंदेह 2017 के बजट में यह राशि 0.4 प्रतिशत कर दी गई परन्तु अमेरिका जैसे विकसित देशों में न्याय पालिका के लिए 4 प्रतिशत से भी अधिक राशि आबंटित की जाती है। केन्द्र सरकार का न्याय मंत्रालय जब तक इस गम्भीर विषय पर उदारता पूर्वक कार्य नहीं करेगा तब तक न्याय तंत्र की मजबूती दूर का सपना ही बना रहेगा। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना बेशक तत्काल रूप से सम्भव न हो परन्तु कुछ अन्य सुझाव केवल आदेशों और बजट में थोड़ी सी वृद्धि करके लागू किये जा सकते हैं। जैसे निर्धारित संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति, सांन्ध्य अदालतों की शुरुआत और न्यायाधीशों को प्रक्रियात्मक कार्यों से मुक्त करके इन कार्यों को कानून में दक्ष सहायक अधिकारियों को सौंपना।

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