युवा पीढ़ी के प्रेरणास्रोत कौन हों ?

– अविनाश राय खन्ना,
उपसभापति, भारतीय रेड क्रास सोसाईटी

जो व्यक्ति देश और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित कर देता है, उसे शहीद का दर्जा दिया जाता है। शहीदी केवल मृत्यु के साथ ही जुड़ी नहीं होती अपितु ऐसे व्यक्ति अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवनभर अपने प्रयासों को भी बिना थके और बिना लोभ-लालच के समर्पित करते दिखाई देते हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में जो भी व्यक्ति जुड़ने का प्रयास करता था वह सदैव अपनी जान हथेली पर रखे हुए ही दिखाई देता था। 30 जनवरी को महात्मा गाँधी के शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के शहीदी के रूप में मनाया जाता है। 21 अक्टूबर पुलिस बल का पृथक शहीदी दिवस है। 17 नवम्बर लाला लाजपत राय का शहीदी दिवस है और 19 नवम्बर को रानी लक्ष्मीबाई के शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन प्रमुख शहीदों के अतिरिक्त भी लाखों अन्य महान आत्माएँ हैं जिन्होंने अपने जीवन देश और समाज की रक्षा और सेवा में ही समर्पित किये हैं। उन सामान्य लोगों की शहादत उनके परिवार की स्मृतियों तक ही सीमित हो जाती है।
दुर्भाग्यवश हमें ब्रिटिश राजनीतिक षड्यन्त्र के तहत एक ऐसा पड़ोसी देश मिला जिसके साथ स्वतंत्रता के बाद की पूरी अवधि लगातार युद्ध और संग्राम में ही दिखाई देती रही है जिसके समाप्त होने की सम्भावना भी निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रही है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में आज यदि भारत के नागरिक सुरक्षित हैं, हमारा देश लगातार विकास के पथ पर अन्तर्राष्ट्रीय मार्ग पर दौड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, हमारे नागरिक अपनी शिक्षा और कला-कौशल का विकास करते हुए सुखी जीवन सम्पन्न कर पा रहे हैं तो इसका पूरा श्रेय देश के उन कोटि-कोटि फौजियों, पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों के उन जवानों को जायेगा जो देश के अन्दर और बाहर से देश की रक्षा के लिए हर प्रकार के हमलों और अपराधों को रोकते हैं और देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपनी जीवनलीला को भी दाँव पर लगा देते हैं। ऐसे शहीद अपने परिवार और बच्चों को अनाथ छोड़कर भारत माता के नाथ अर्थात् संरक्षक की भूमिका निभाते हैं।
जब भी सीमा पर किसी फौजी की शहादत का समाचार मिलता है तो सीमा से लेकर उस फौजी के घर, गली, गाँव और शहर तक एक श्रद्धापूर्ण वेदना से भरी तरंगें दिखाई देती है। इसी प्रकार अपराधियों से लड़ते हुए पुलिस बल के जवान भी अपनी जान की बाजी लगाते हुए देखे जा सकते हैं। फौज और सरकार के उच्चाधिकारी पूरे सम्मान के साथ उस शहीद का छलनी शरीर अन्तिम संस्कार के लिए लाते हुए दिखाई देते हैं। सरकारों की तरफ से पर्याप्त मुआवजा और बच्चों की शिक्षा, नौकरी आदि का प्रबन्ध करने के प्रयास भी दिखाई देते हैं। परन्तु कुछ ही सप्ताह या महीनों के बाद वे सारी वेदना तरंगे केवल परिवार तक ही सीमित हो जाती हैं। शहादत के कुछ समय बाद ही समाज और सरकारें फिर से अपने-अपने आनन्द में मग्न दिखाई देती हैं जबकि शहीद का बेसहारा परिवार अपने दुःखों को ही अपनी पहचान बना लेता है। कुछ स्थानों में अवश्य ही समय-समय पर अपने क्षेत्रीय शहीदों की स्मृति में कुछ छुट-पुट कार्यक्रमों के आयोजन चलते रहते हैं, परन्तु ऐसे आयोजन भी एक-दो वर्ष के बाद स्वतः ही समाप्त दिखाई देते हैं। स्मृति कार्यक्रमों के अतिरिक्त एक शहादत की प्रेरणा उत्पन्न होनी चाहिए। परन्तु शहीद फौजी परिवार की दुर्दशा देखकर देशसेवा में शहीद होने की प्रेरणा नहीं अपितु अन्य नागरिकों के मन में इसका उल्टा प्रभाव पड़ने लगता हैै। लोग अपने युवकों को देशसेवा के उद्देश्य से फौज तथा पुलिस बलों जैसे विभागों में जाने से रोकते हुए दिखाई देते हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में एक विशेष योजना बनाकर इन शहीदों की स्मृति को पूरा सम्मान देने के कार्यक्रम प्रारम्भ करने चाहिए। इस दिशा में एक साधारण परन्तु दूरगामी प्रभाव वाली योजना यह बन सकती है कि शहीद होने वाले प्रत्येक फौजी या पुलिस अधिकारी का एक बड़ा चित्र उसके संक्षिप्त परिचय तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ उस विद्यालय के किसी एक कमरे में स्थापित किया जाये जिसमें कभी वह जवान छात्र के रूप में पढ़ता था। इस चित्र और स्मृति के साथ देश के लिए पूर्ण समर्पण और सेवा भावना की प्रेरणाएँ भी शामिल की जानी चाहिए। ऐसे शहीदों की पुण्यतिथि के अवसर पर भी विद्यालयों में प्रार्थना सभा के समय उनके परिजनों तथा समाज के अन्य लोगों की उपस्थिति में उन्हें स्मरण किया जाये। केवल सड़कों के नामकरण आदि से प्रेरणाओं का संचार इतना नहीं हो पाता जितना विद्यालयों के माध्यम से सम्भव हो सकता है। विद्यालय में युवावस्था की ओर अग्रसर होते हुए बालक-बालिकाएँ प्रेरणाओं को धारण करने में अधिक जीवन्त साबित हो सकते हैं।
दिल्ली के इंडिया गेट पर स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले अनेकों शहीदों के नाम लिखे गये हैं। परन्तु आज इण्डिया गेट केवल एक पर्यटक स्थल बनकर रह गया है। इन्हीं शहीदों के नाम, चित्र, परिचय और प्रेरणाएँ यदि इनके विद्यालयों में स्थापित किये जाते तो आज उन गुमनाम परिवारों को भी बराबर सम्मान मिलता रहता। एक जीवन की शहादत के बदले केवल एक दिन का सांकेतिक सम्मान न तो उस परिवार का कुछ कल्याण कर सकता है और न ही देश और समाज के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इसलिए शहीदों का सम्मान तभी चिरस्थाई हो सकता है जब उनके विद्यालयों में उनकी स्मृतियाँ स्थापित की जायें।
विद्यालयों में शहीदों के चित्र, परिचय और प्रेरणाएँ स्थापित करने के कई लाभ होंगे। शहीद परिवारों का परिचय और उनके प्रति सहानुभूति की भावनाएँ लगातार बनी रहेँगी। शहीद व्यक्ति के जन्मदिन और पुण्य तिथि पर उनके परिवारों को आमंत्रित करके विशेष आयोजनों के मार्ग प्रशस्त होंगे। एक शहीद परिवार को सम्मानित करने का अर्थ होगा कि अनेकों बाल और युवक भी ऐसे राष्ट्रसेवा कार्यों के लिए प्रेरित होंगे और उनके परिवार भी ऐसी प्रेरणाओं में बाधक नहीं बनेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *