राजस्थान के प्रख्यात संगीतकार -गजानन वर्मा

23 मई जन्मदिवस पर विशेष

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार
राजस्थानी भाषा के प्रख्यात कवि, गीतकार, संगीतकार, गायक, लेखक, नाटककार व एक जिंदादिल व्यक्तित्व गजानन वर्मा अब स्मृति शेष हैं। गजानन वर्मा के लिखे व गाये गीत उनके जीवनकाल में ही लोकगीत बन जनमानस में गूंजने लगे जो हमेशा गाये व गुनगुनाये जायेंगे। गजानन वर्मा का जन्म 23 मई 1926 राजस्थान के चूरु जिले के रतनगढ़ कस्बे में हुआ।
गजानन वर्मा ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विशारद हिन्दी परीक्षा उतीर्ण की और उसके बाद आगरा चले गये। वहां नागरी प्रचारीणी सभा से इन्होंने हिन्दी की सर्वाच्च परीक्षा साहित्यरत्न उतीर्ण की। संस्कृत शिक्षा में इनके गुरु पण्डित श्री राम जी शास्त्री व स्वामी चेतनानन्द रहे,और साहित्यरत्न की शिक्षा में इनके गुरु डॉ.सत्येन्द्र जी व पद्म सिंह शर्मा(कमलेश) रहे। सुप्रसिद्व उपन्यासकार श्री राजेन्द्र यादव जैसे कई साहित्यकार इनके सहपाठी रहे। आगरा में इनके साहित्य मित्रों में श्री रांगेय राघव व घनश्याम अस्थाना का नाम प्रमुख है।
1945 में गजानन वर्मा की हिन्दी कविताओं का पहला संग्रह स्पन्दन नाम से लखनऊ से प्रकाशित हुआ। 1950 के बाद 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में दिल्ली के लाल किले में होने वाले कवि सम्मेलनों में राजस्थान से श्री गजानन वर्मा को बुलाया जाता था। लाल किले के कवि सम्मेलन का ही एक प्रसंग है जब कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथी तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. श्री जवाहरलाल नेहरु थे। तब श्री वर्मा ने एक ध्वनि गीत सुनाया–
सटक नली रै भाई सटक नली
घी को मिरियो गुड़ की डली रै भाई सटक नली
गीत समाप्त होने पर नेहरु जी उठे और उन्होंने गजानन जी वर्मा की पीठ थपथपाई। सन् 1954 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद के रतनगढ़ आगमन पर गजानन वर्मा ने उनके सम्मान में अपना एक हिन्दी गीत ‘चाह यह मेरी अकिंचन‘ गाकर सुनाया। बाद में यह गीत मासिक पत्र ‘विशाल भारत‘व राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रंथ में प्रकाशित हुआ।
गजानन वर्मा ने केशव कोठारी व अन्य मित्रों के साथ मिलकर ’पुतलीघर’नाम से संस्था बनाई जिसमें सर्वप्रथम गजानन वर्मा द्वारा लिखित एवम निर्देशित पुतली नाटक अमर सिंह राठौड़ का प्रदर्शन दिल्ली के इंडियन फाइन आर्ट्स थियेटर हॉल में किया गया जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने किया था। पुतलीघर संस्था के अन्तर्गत देश के कई शहरों में नाटकों का मंचन हुआ। अमर सिंह पुतली नाटक को उदयपुर में भारतीय लोककला मंडल द्वारा आयोजित पुतली नाटिका की अखिल भारतीय प्रतिस्पर्धा में प्रथम स्थान मिला और उस समय भारत के शिक्षा मंत्री रहे हुमायुं कबीर द्वारा पुरस्कार प्रदान किया गया। उन दिनों पाकिस्तान की सैनिक हलचल कश्मीर में तो थी ही,राजस्थान की सीमा पर भी सैनिक हलचलें बढने लगी थीं। जोधपुर प्रवास के समय गजानन वर्मा ने वीर रस प्रधान काफी गीत लिखे जो बड़े ही लोकप्रिय हुए। उनमें से एक गीत ये है:-
सुण दिखणादी बादली-उतरा दै छेडै जा,
पीव जठै रण मैं जूझै तू बांनै हंस बतला ए,
सुण दिखणादी बादली।
गजानन वर्मा के वीर रस प्रधान गीतों को उस समय दी ग्रामोफोन कम्पनी एच.एम.वी. जिसका अब नाम सा रे गा मा है ने उन्हीं की आवाज व संगीत निर्देशन में रेकॉर्ड्स पर जारी किया। इन गानों ने काफी धूम मचाई। इसके बाद सा रे गा मा ने इनके गीत व संगीत निर्देशन में दो ऑडियो एलबम ’गंठ जोड़ो ’और ’सुरंगो सासरियो’ ऑडियो कैसेट्स के माध्यम से जारी किये। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों व कवि सम्मेलनों में भी इन्होंने काफी गीत गाये और घर-घर में रेडियो और टी.वी. के माध्यम से इनके गीत बजने लगे। गजानन वर्मा ने कई नृत्य नाटक भी लिखे जिनमें बारहामासा, सुहागरात, मीरा, बनड़ौ-बनड़ी, महेश, चैमासो, घूघरा का बोल, सत्तर खान बहत्तर उमराव, आदि प्रमुख हैं। इनमें से बारहामासा नाटक का मंचन गजानन वर्मा के निर्देशन में मुम्बई के बिरला मातुश्री सभागार में बड़े पैमाने पर हुआ। नाटकों का मंचन करते हुए गजानन वर्मा का परिचय दादा साहेब फाल्के अवार्ड विजेता डॉ. भूपेन हजारिका व राजकपूर की फिल्मों के गीतकार शैलेन्द्र से हुआ।
फिल्म जगत में भी गजानन वर्मा ने सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता व संगीत निर्देशक डॉ. भूपेन हजारिका के साथ मिलकर काम किया। डॉ. भूपेन हजारिका की हिन्दी फिल्मों मेरा धर्म मेरी मां व चमेली मेमसाब में श्री वर्मा ने गीत लिखे। तथा बंगला भाषा की जात्री और चिकमिक बिजुली में इन्होंने अभिनय भी किया। असमिया फिल्म लोटी घोटी में इनका एक गीत फागण आयो रै हठीला म्हारी बाजै बंगड़ी बड़ा लोकप्रिय हुआ। इसके बाद गजानन वर्मा ने अपने ही गीत,संगीत व निर्देशन में राजस्थानी प्रयोगात्मक फिल्म ’सुपनौ-कुरजां’ ’हल्दी को रंग सुरंग’ ’बनड़ौ-बनड़ी’ का निर्माण किया।
गजानन जी ने कई आध्यात्मिक रचनाऐं भी लिखीं जिनमें से ’मीरा’ व ’ओम शिव शक्तिमती माँ’ को पद्मा बिनानी फाउन्डेशन द्धारा इन्हीं के संगीत निर्देशन में जारी किया गया। अभी वर्तमान में पद्मा बिनानी फाउन्डेशन द्धारा इनके एक और प्रोजेक्ट ‘अष्टनायिका‘ का निर्माण किया जा रहा है। वीणा केसेट्स पर भी इनके दो अलबम ‘बत्तिसी मायरो‘ और ‘बाजरै की रोटी‘ अभी हाल ही में रीलीज हुए। गजानन वर्मा को राजस्थानी साहित्य,गीत,लोक संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया व पुरस्कारों से नवाजा गया था। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनमें- स्पन्दन, धरती री धुन, सोनो निपजे रेत में, बारहामासा, मैं तेरा सुर तुम रुति मेरी, हैलो मार सुर सिणगार, भावानुबन्ध, ए म्हारी हल्दी को रंग सुरंग प्रमुख रुप से उल्लेखनीय है।
गजानन जी ने अपने भतीजे कपिल नोखवाल को साथ लेकर सन् 2011 में अपना होम प्रोडक्शन मयूर ऑडियो विजुअल प्रोडक्शन के नाम से स्थापित किया। और सन् 2011 में ही गजानन जी व कपिल ने ’सुण दिखणादी बादळी’ शीर्षक से एलबम पर काम शुरु किया। इस अलबम की विडियो शूटिंग शुरु होने के ठीक एक दिन पहले 17 मई 2012 को गजानन वर्मा का स्वर्गवास हो गया। अब इस एलबम की विडियो शूटिंग का कार्य पूरा हो चुका है। इस अलबम में गजानन वर्मा के कुल आठ गीत हैं।

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