सरकारी चिकित्सा सेवा में सुधार के प्रयास

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
प्रत्येक राज्य में मेडिकल शिक्षा से सम्बन्धित सभी पाठ्यक्रमों में भर्ती के समय सामान्यतः उसी राज्य का निवासी होने की शर्त लगा दी जाती है। यदि असम राज्य से सम्बन्धित मेडिकल शिक्षा संस्थानों में छात्रों को दाखिला दिया जाना है तो नियमों के अनुसार प्रवेशार्थी का 7वीं से 12वीं कक्षा तक असम राज्य के शिक्षण संस्थानों में ही अध्ययन आवश्यक है। इस नियम के अपवाद केवल उस अवस्था में लागू होते हैं जब असम सरकार या किसी अन्य सरकारी संस्थान अथवा केन्द्र सरकार का कोई कर्मचारी अपनी नौकरी के कारण राज्य से बाहर नियुक्त हो और मजबूरी में उसके बच्चों को नियुक्ति वाले राज्य में ही 7वीं से 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करनी पड़ी हो। क्या ऐसी शर्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है? ऐसे नियमों के कारण स्वाभाविक रूप से अन्य राज्यों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएँ असम के मेडिकल संस्थानों में दाखिले के लिए आवेदन ही नहीं कर सकते।
असम ही नहीं अपितु अन्य राज्य सरकारें भी अपने राज्यों में इस प्रकार के नियम लागू करती हैं। मेडिकल शिक्षा से सम्बन्धित दाखिलों के लिए इस नियम का विशेष कारण यह बताया जाता है कि असम के अतिरिक्त अन्य राज्यों से आने वाले छात्र-छात्राएँ मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने के बाद असम के नागरिकों को अपनी सेवाएँ उपलब्ध नहीं करवाते क्योंकि ऐसे छात्र अक्सर अपने गृह राज्यों या बड़े शहरों में ही कार्य करना पसन्द करते हैं। वैसे असम सरकार द्वारा मेडिकल शिक्षा के लिए दाखिला केवल असम के छात्र-छात्राओं को ही देने के अतिरिक्त यह नियम भी निर्धारित किया गया था कि मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद प्रत्येक डाॅक्टर न्यूनतम 5 वर्ष असम में ही अपनी सेवाएँ प्रदान करेगा या एक वर्ष वह असम के किसी गाँव में अपनी सेवाएँ प्रदान करेगा। इस बाॅड का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 30 लाख रुपये का जुर्माना मुआवजा देना होगा। इस नियम का उद्देश्य यह था कि प्रत्येक योग्यता प्राप्त चिकित्सक असम की जनता को अपनी सेवाएँ अवश्य प्रदान करे।
कुछ छात्रों ने असम सरकार के मेडिकल शिक्षा संस्थानों में भर्ती के लिए असम से ही स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाले नियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि जब असम सरकार ने 30 लाख रुपये के बाॅड की शर्त लागू कर ही रखी है और असम के अतिरिक्त अन्य राज्यों से सम्बन्धित कोई भी नागरिक यदि इस बाॅड को भरने के लिए तैयार है तो असम राज्य में स्कूली शिक्षा प्राप्त न करने के कारण उसे दाखिले से इन्कार करना उचित नहीं है।
राज्य सरकार की तरफ से उक्त नियम को उचित ठहराते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि असम के छात्रों को ही मेडिकल शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि उनके द्वारा ऐसी शिक्षा के बाद असम के नागरिकों की सेवा में लम्बा समय बिताने की सम्भावना अधिक है। अन्य राज्यों से असम में आकर मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए केवल बाॅड लेने का प्रावधान असम की जनता को लम्बे समय तक चिकित्सा सुविधाओं की गारण्टी नहीं दे सकता।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री अरूण कुमार मिश्रा एवं श्री अब्दुल नजीर की पीठ ने असम सरकार के इन नियमों को उचित ठहराते हुए कहा कि मेडिकल शिक्षा से सम्बन्धित पाठ्यक्रमों के लिए उसी राज्य का निवासी होने की शर्त को अनुचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसका सीधा सा उद्देश्य है अपने राज्य के छात्रों के शैक्षणिक स्तर को ऊँचा उठाना तथा जनता की सेवा के लिए उसी राज्य के छात्रों को तैयार करना। न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के ही कई पूर्व निर्णयों में मेडिकल शिक्षा में ही स्नातकोत्तर तथा और अधिक उच्च शिक्षा के लिए उसी राज्य के निवासियों को आरक्षण तो उचित नहीं है, परन्तु स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में यह आरक्षण राज्य की जनता के कल्याण के लिए ही निर्धारित किये गये हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में भी इस आरक्षण नियम को लचीला बनाने से इन्कार कर दिया जिनमें माता-पिता असम के ही निवासी हैं परन्तु बच्चे 7वीं से 12वीं कक्षा के अध्ययन के लिए असम के बाहर अन्य राज्यों में भेज दिये गये थे। जब कोई व्यक्ति अपने बच्चों को सामान्य स्कूली शिक्षा के लिए अपने राज्य से बाहर भेज सकता है तो ऐसे लोगों को भी केवल असम निवासी होने का लाभ नहीं मिल सकता। इसी प्रकार जो लोग निजी रोजगार के कारण असम से बाहर चले जाते हैं और उनके बच्चे अन्य राज्यों में ही स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं, उन्हें भी मेडिकल शिक्षा में असम के विद्यार्थी होने वाला लाभ नहीं मिल सकता।
इससे यह स्पष्ट है कि असम सरकार का यह नियम केवल असम निवासी होने के आधार पर नहीं था अपितु एक तरफ असम के स्कूली विद्यार्थियों को मेडिकल जैसी उच्च शिक्षा में प्रेरित करने का आरक्षण था और इसका दूसरा उद्देश्य असम की जनता को लम्बे समय तक चिकित्सकों की सुविधा उपलब्ध कराने का था। इन कारणों से सर्वोच्च न्यायालय ने चिकित्सा सेवाओं के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए असम सरकार के उक्त नियम को उचित ठहराया।
जनता को चिकित्सा सुविधाओं से सम्बन्धित एक अन्य मामला भी सर्वोच्च न्यायालय की इसी पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य के कई सरकारी चिकित्सकों ने सेवा से निवृत्ति का आवेदन सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया। जब लम्बे समय तक इनकी सेवा निवृत्ति प्रार्थनाओं पर राज्य ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो इन सभी चिकित्सकों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में इन चिकित्सकों को सेवा निवृत्त घोषित कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में राज्य की चिकित्सा व्यवस्था के सम्बन्ध में टिप्पणियाँ करते हुए यह प्रश्न किया कि राज्य सरकार को चिकित्सा व्यवस्था में सुधार करने की तरफ ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इन्हीं कारणों से चिकित्सक सरकारी नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य होते हैं। एक तरफ उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश चिकित्सा व्यवस्था में डाॅक्टरों की कमी को बड़ी गम्भीरता के साथ अपने निर्णय में लिखा और व्यवस्था सुधार के उपदेश भी दिये परन्तु साथ ही याचिकाकर्ता चिकित्सकों की सेवा निवृत्ति को अनुमति भी प्रदान कर दी। उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि किसी कर्मचारी को सेवा निवृत्त करना या न करना सरकार का अधिकार है। जनहित में यदि सम्बन्धित व्यक्ति की सेवाएँ आवश्यक हैं तो सरकार उसकी सेवा निवृत्ति प्रार्थना को रद्द भी कर सकती है। स्वतः ही किसी नौकरी से सेवा निवृत्ति नहीं मिल सकती जब तक नौकरी देने वाला व्यक्ति उसकी अनुमति न दे। उत्तर प्रदेश में चिकित्सकों की कमी को देखते हुए इन चिकित्सकों को सेवा निवृत्त न करने को अनुचित नहीं कहा जा सकता है।
इन दोनों निर्णयों से यह सिद्ध होता है कि हमारे देश की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी चिकित्सकों की कम संख्या ही दिखाई देती है। इसीलिए सरकारें सदैव सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में अधिक से अधिक चिकित्सकों को भर्ती करने की योजनाएँ बनाने के लिए प्रेरित रहती हैं और सरकारी चिकित्सा में आने के बाद कोई व्यक्ति सरकारी सेवा का त्याग न करे इसके लिए भी नियमों और कानूनों का सहारा लेना पड़ता है।

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