बच्चियों को कामुक शोषण से बचाने का महाअभियान

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
कार्य स्थलों पर महिलाओं के कामुक शोषण को समाप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की प्रेरणा पर वर्ष 2013 में भारतीय संसद ने कानून बनाया। इस कानून के अनुसार जिस किसी कार्य स्थल पर 10 से अधिक महिलाएँ कार्यरत हों वहाँ एक आन्तरिक जाँच समिति का गठन अत्यन्त आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक कार्य स्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को सर्वप्रथम आन्तरिक व्यवस्था के माध्यम से ही सुनिश्चित किया जाये। इस कानून का दायरा ऐसे स्थलों तक बढ़ाने के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका लम्बित है जो स्थल कार्यस्थल की परिभाषा में नहीं आते, परन्तु वहाँ बड़ी संख्या में महिलाओं का नियमित आना-जाना होता है। जैसे – मदरसे, चर्च और आश्रम आदि। इसके अतिरिक्त विद्यालय भी ऐसे ही स्थल माने जा सकते हैं जहाँ अध्यापिकाओं के साथ-साथ अबोध अवस्था से लेकर युवा अवस्था की दहलीज पर पहुँचने वाली छात्राएँ भी शामिल हैं। जब कार्य स्थल पर सुरक्षा की बात आती है तो भारत के सभी विद्यालय और काॅलेज स्वाभाविक रूप से ऐसे ही कार्य स्थल समझे जाने चाहिए जैसे उक्त कानून में शामिल किये गये हैं।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष कामुक शोषण से पीड़ित एक छात्रा के माता-पिता ने रिट् याचिका के माध्यम से कुछ विशेष प्रार्थनाएँ न्यायालय के समक्ष रखी, परन्तु सुनवाई के दौरान वह रिट् याचिका कुछ व्यक्तिगत अधिकारों से आगे बढ़ते हुए एक ऐसी दिशा में चलने लगी जिसमें विद्यालय की सभी छात्राओं की सुरक्षा के प्रश्न पर चर्चा होने लगी। इस चर्चा के परिणामस्वरूप न्यायालय ने कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अतिरिक्त विशेषज्ञों सहित एक समिति का गठन किया। इस समिति ने अनेकों विद्यालयों के प्रबन्धकों तथा अन्य लोगों से विचार-विमर्श करने के उपरान्त कुछ मानक निर्देश तैयार किये। न्यायालय में उन मानक निर्देशों पर चर्चा होने के उपरान्त सहायक वकीलों और सरकारी अधिवक्ताओं से भी विचार-विमर्श किया गया। सरकारी अधिवक्ताओं ने इस रिपोर्ट पर सहमति भी प्रदान कर दी जिसका निष्कर्ष यह था कि पश्चिम बंगाल राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों की सहायता एवं उन्हें जागरूक बनाने के लिए सलाहकार नियुक्त किये जायें। परन्तु सरकारी वकीलों का यह कहना था कि पूरे राज्य में लगभग एक लाख सरकारी विद्यालय हैं। अतः एक लाख सलाहकारों की नियुक्ति समयबद्ध रूप में सम्भव नहीं है। एक लाख सलाहकारों की नियुक्ति वास्तव में एक बहुत विशाल कार्य था। परन्तु न्यायालय का मानना था कि इस राज्य के भविष्य को देखते हुए यह विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अतः न्यायालय ने इस सलाहकार नियुक्ति अभियान को सम्पन्न करने में उदारतापूर्वक समय का विस्तार कर दिया। अदालत के आदेश के अनुसार यह पूरा कार्य अगले एक वर्ष में सम्पन्न किया जाये। इसके लिए सलाहकारों की नियुक्ति के साथ-साथ उन सलाहकारों को प्रशिक्षित करने की भी आवश्यकता है। न्यायालय ने अपने आदेश में सरकार को यह चेतावनी भी दी है कि यदि ऐसा न किया गया तो इसका खामियाजा वकीलों, न्यायाधीशों और सरकार को नहीं अपितु बच्चों को भुगतना पड़ेगा। केवल बच्चों की रक्षा के लिए ही न्यायालय ने इतने बड़े कार्य को सम्पन्न करवाने के लिए निर्देश जारी करना उचित समझा है। न्यायालय ने इन रिट् याचिकाओं की सुनवाई समाप्त करने के स्थान पर छः महीने बाद पुनः सुनवाई के लिए निर्धारित किया है जिससे कार्य प्रगति की रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत हो सके। न्यायालय ने सभी सम्बन्धित पक्षों के वकीलों के प्रति विशेष रूप से धन्यवाद का उल्लेख भी अपने आदेश में किया है। बिकाश राय वनाम पश्मि बंगाल राज्य नामक मुकदमें का यह आदेश पश्चिम बंगाल राज्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
वास्तव में ऐसे निर्णयों की प्रत्येक राज्य को आवश्यकता है। अलग-अलग उच्च न्यायालय अपनी-अपनी राज्य सरकारों के लिए आदेश जारी करें, इससे अच्छा यही होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक ऐसी जनहित याचिका प्रस्तुत की जाये जिसमें केन्द्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों के लिए ऐसे निर्णय जारी किये जायें। परन्तु इस निर्णय के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा वित्तीय बोझ को लेकर ही दिखाई दे रही है। एक राज्य में यदि एक लाख नियुक्तियों की आवश्यकता है तो सारे देश में किसी भारी पैमाने पर नियुक्तियों की आवश्यकता होगी और इसके लिए कितना विशाल वित्तीय बोझ तैयार होगा। क्या हमारा देश इतने विशाल बोझ को सहन करने के लिए तैयार है? बच्चियों और महिलाओं की सुरक्षा के सामने वैसे तो किसी बड़े से बड़े वित्तीय बोझ को भी बड़ा नहीं समझा जाना चाहिए। कामुक शोषण से बचाव के लिए केन्द्र और सभी राज्य सरकारें यदि संवेदनशीलता से विचार करें तो यह सारा काम मामूली से बजट के माध्यम से भी सम्पन्न किया जा सकता है। नये सलाहकार नियुक्त करने के स्थान पर सभी सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में से एक संवेदनशील और वरिष्ठ महिला शिक्षक को चुन लिया जाये जो इस कार्य को एक अतिरिक्त कार्य समझकर सेवाभाव से तत्पर हो। ऐसी वरिष्ठ महिला शिक्षिकाओं को विशेष प्रशिक्षण देकर विद्यालय की छात्राओं के मध्य कामुक शोषण से बचाव का एक महा अभियान प्रत्येक राज्य को प्रारम्भ कर देना चाहिए। जहाँ एक तरफ बालिकाओं की सुरक्षा के लिए यह जागृति अभियान चलाया जाये, वहीं दूसरी तरफ विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को भी यह विशेष नैतिक निर्देश दिये जायें कि उन्हें विद्यालय में छात्राओं और समाज में सामान्य जीवन बिताते हुए अन्य महिलाओं के प्रति अपने अन्दर कामुकता पैदा नहीं होने देनी चाहिए। छात्रों में इन नैतिक निर्देशों का संचार करने के साथ-साथ उन्हें कानूनी प्रावधानों के डर से भी प्रेरित किया जाना चाहिए। छात्राओं के लिए महिला शिक्षक को विशेष सलाहकार की तरह प्रशिक्षित करने के साथ-साथ देश के प्रत्येक विद्यालय में एक पुरुष शिक्षक को भी इसी प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वह छात्रों के बीच कामुक भावनाओं से बचे रहने के नैतिक और कानूनी दृष्टिकोण लगातार प्रस्तुत करता रहे।

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