अन्धा कानून और दृष्टिहीन न्यायाधीश

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
न्यायालयों के न्याय की कल्पना के साथ एक ऐसी मूर्ति को सारे विश्व में मान्यता प्राप्त है जिसकी आंखों पर काली पट्टी बंधी हुई है और हाथों में तराजू है। काली पट्टी का अर्थ है कि न्यायाधीश को अपने व्यक्तिगत नजरिये से कुछ भी नहीं देखना, किसी डर या पक्षपात, स्वार्थ और सत्ता लोभ आदि के बिना निर्णय देने हैं। गवाहियों तथा प्रमाणों के माध्यम से जो कुछ भी उसके सामने अर्थात् मुकदमें की फाइल में प्रस्तुत हो केवल उसी के आधार पर निर्णय देना है। न्याय की इस मूर्ति के हाथ में तलवार न्यायालय की शक्ति का संकेत देती है। इन सभी सिद्धान्तों के बीच भारत का सर्वोच्च न्यायालय यह निर्णय देता है कि एक पूर्ण दृष्टिहीन व्यक्ति न्यायाधीश बनने के योग्य नहीं है क्योंकि न्यायाधीश को देखने, सुनने और वाणी से वार्तालाप करने जैसी शक्तियों की नितान्त आवश्यकता होती है जिनके आधार पर वह मुकदमों की सुनवाई करके निर्णय दे सके।
तमिलनाडू सरकार के द्वारा राज्य की जिला अदालतों में न्यायाधीश के 162 पदों के लिए जारी किये गये विज्ञापन में सुरेन्द्र मोहन नामक एक ऐसे अधिवक्ता ने भी आवेदन कर दिया जो 70 प्रतिशत दृष्टिविहीन था। सुरेन्द्र मोहन वास्तव में सरकारी अधिवक्ता की तरह कार्य कर रहा था। सुरेन्द्र मोहन के द्वारा लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद उसे साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया। उसने मद्रास उच्च न्यायालय में रिट् याचिका प्रस्तुत की जिसे इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि तमिलनाडू सरकार द्वारा दिव्यांगजनों के लिए बनाये गये कानून में यह नियम लागू किया था कि 50 प्रतिशत से अधिक दृष्टिहीन व्यक्ति न्यायाधीश के लिए आवेदन नहीं कर सकता। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सुरेन्द्र मोहन ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया परन्तु यहाँ भी उसे पराजय ही प्राप्त हुई।
सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर अपने निर्णय में कहा कि नौकरी देने वाले संगठन का यह अधिकार है कि नौकरी की योग्यताओं का इस प्रकार निर्धारण करे जिससे नियुक्त व्यक्ति कार्य की प्रकृति के अनुसार योग्यता पूर्वक कार्य कर सके। वैसे लगभग दो वर्ष पूर्व ही सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में यह कहा था कि जीवन का अधिकार दिव्यांगजनों के लिए और अधिक महत्त्व रखता है जिन्हें अपनी योग्यताओं को बढ़ाने के लिए अधिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है जिससे वे सम्मानपूर्वक आजीविका अर्जित कर सके। सर्वोच्च न्यायालय के इन दोनों निर्णयों में एक विरोधाभास छिपा हुआ दिखाई देता है। एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय दिव्यांगजनों को पूर्ण सुविधायुक्त करने की बात कहता है, भारत की संसद उन्हें विशेष आरक्षण प्रदान करती है तो दूसरी तरफ राज्य सरकारें यदि उनकी अपंगता का प्रतिशत निर्धारित करके उन्हें आजीवन अयोग्य व्यक्तियों की श्रेणी में खड़ा करना चाहती है तो सर्वोच्च न्यायालय को तमिलनाडू सरकार से यह पूछना चाहिए था कि 50 प्रतिशत दृष्टिहीनता का स्तर निर्धारित करने से पूर्व किस विशेषज्ञ सिद्धान्तों और तथ्यों का सहारा लिया गया है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि 50 प्रतिशत से अधिक स्तर वाला दृष्टिहीन व्यक्ति न्यायाधीश बनने के योग्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्यात्मक छानबीन के बिना तमिलनाडू सरकार के द्वारा दृष्टिहीनता की सीमा निर्धारित करने वाले नियम को मान्यता प्रदान कर दी। सर्वोच्च न्यायालय को विश्वभर के ऐसे उदाहरणों का अवलोकन करना चाहिए था जिसमें पूर्ण दृष्टिहीन व्यक्ति भी न्यायाधीश पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं। तमिलनाडू सरकार ने दृष्टिहीनता की सीमा वर्ष 2014 में निर्धारित की थी, जबकि इससे पूर्व वर्ष 2009 में टी. चक्रवर्ती पूर्ण दृष्टिहीनता के बावजूद न्यायाधीश पद पर कार्य कर रहे थे। राजस्थान के अजमेर जिले में एक न्यायाधीश श्री ब्रह्मानन्द शर्मा पूर्ण दृष्टिहीन होने के बावजूद आधुनिक कम्प्यूटर प्रणालियों आदि के माध्यम से अपना कार्य विधिवत सम्पन्न कर रहे हैं। वे वकीलों को सभी पत्रावलियाँ पढ़ने के लिए कहते हैं तो उसे रिकाॅर्ड कर लेते हैं। रिकाॅर्ड किये गये वक्तव्यों को बार-बार सुनकर वे अपना निर्णय देते हैं।
भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी अब अनेकों दृष्टिहीन व्यक्ति उच्च न्यायिक पदों पर कार्य कर रहे हैं। पाकिस्तान का एक युवक यूसुफ सलीम पंजाब विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री लेते हुए स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाला घोषित हुआ। न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए आयोजित लिखित परीक्षा में 6500 उम्मीदवारों को पछाड़ते हुए भी वह प्रथम स्थान पर सफल घोषित हुआ, परन्तु उसे दृष्टिहीनता के कारण साक्षात्कार के लिए बुलाया ही नहीं गया। पाकिस्तान के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने इस घटना पर स्वतः संज्ञान लेते हुए यह व्यवस्था जारी की कि दृष्टिहीन होने के बावजूद भी कोई व्यक्ति न्यायाधीश का पद प्राप्त कर सकता है।
अमेरिका के मिशीगन राज्य में भी कुछ वर्ष पूर्व रिचर्ड बर्नस्टीन को दृष्टिहीन होने के बावजूद न्यायाधीश बनाया गया जो अब मिशीगन सर्वोच्च न्यायालय में कार्य कर रहे हैं। श्री रिचर्ड जन्म से दृष्टिहीन थे। साऊथ अफ्रीका के जकारिया मोहम्मद याकूब 16 वर्ष की अवस्था में दृष्टिहीन हो चुके थे परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रगति को यह अयोग्यता बाधित न कर पाई और वे दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने वाले प्रथम दृष्टिहीन जज बनने में सफल हुए। श्री जकारिया को एक कानून में प्रशिक्षित योग्य सहायक दिया गया था, उन्हें एक बोलने वाला कम्प्यूटर भी दिया गया था जिसके साथ बरेल भाषा में प्रिंट करने वाला प्रिंटर भी था। इसके अतिरिक्त उन्हें कई अन्य सहायक यन्त्र आदि भी उपलब्ध कराये गये। उनके अनुसार ऐसा मानना कि न्यायाधीश को किसी गवाह की विश्वसनीयता जांचने के लिए उसकी शक्ल देखने की आवश्यकता होती है, पूरी तरह से नादानी भरा वक्तव्य है और इस वक्तव्य का समर्थन केवल देखने योग्य व्यक्ति ही करते हैं, जबकि दृष्टिहीन व्यक्ति किसी से बात करते हुए उसकी विश्वसनीयता का आंकलन करने में सक्षम होता है।
सर्वोच्च न्यायालय के ही एक अन्य निर्णय में न्यायाधीशों की मूल योग्यताओं का उल्लेख करते हुए यह कहा गया है कि न्यायाधीशों में विवेक, धैर्य, जीवन की वास्तविकताओं का ज्ञान, पक्षपातरहित और स्वतंत्र बुद्धि, कानून का ज्ञान, नैतिक बहादुरी और न्याय के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना होनी चाहिए। इन योग्यताओं में दृष्टिहीनता कहीं भी बाधक बनती हुई दिखाई नहीं देती है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय स्वयं में ही दूरदृष्टि से विहीन प्रतीत होता है। भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय को तथा सरकारों को भी यह स्वीकार करना ही होगा कि भौतिक दृष्टिहीनता न्याय के पथ पर बाधक नहीं हो सकती, इससे अधिक बाधक तो नैतिक दृष्टिहीनता है, जिसके कारण सब कुछ देखने-सुनने वाले योग्य न्यायाधीश भी न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

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