नये विमर्श का प्रस्थान-बिंदु : ‘‘जुर्रत ख्वाब देखने की’’

चर्चित कवयित्री रश्मि बजाज का सद्य प्रकाशित पांचवां काव्य-संकलन ‘‘जुर्रत ख्वाब देखने की’’ (अयन प्रकाशन, देहली) विचार तथा भाव के स्तर पर उद्वेलित करने वाला एक लीक से हट कर लिखा गया काव्य-संग्रह है। कवयित्री ने अपनी इस कृति को ‘‘कवि के, कविता के साहस, संघर्ष, सौन्दर्य’’ को समर्पित किया है और संग्रह का मार्ग-दर्शक सूत्र है प्राक्कथनीय पंक्तियांर – ‘‘शर-शैय्या पर पड़ा हमारा छलनी युग/चाहता है कविता हो छल से ज्यादा कुछ’’। चार खण्डों-‘कोई उन्मादी लिखता कविता’, ’रहेंगे जिंदा’, ‘ये वक्त न तेरे थमने का’, ‘मैं हूँ स्त्री’ में प्रस्तुत 40 कविताएं एक बेबाक ईमानदारी, जीवट और जुर्रत से अनुप्राणित हैं।
ये कविताएं एक नये विमर्श का सूत्रपात करती प्रतीत होती हैं। पिछले कुछ दशकों से केन्द्र में रही अस्मिता-केन्द्रित विचारधाराओं के परे जा कर यहां मनुष्य की वृहद् अस्मिता – ‘मानव-अस्मिता’ को प्राथमिक रूप से स्थापित किया गया है। कवयित्री की पीड़ा एवं करुणा-भाव का फलक अति विस्तृत है। एक ओर सर्वहारावर्गीय ‘कल्लू’, ‘करमा’ और ‘संतरो’ के अश्रु उसकी आंखों से बहते हैं – ‘‘तड़पती तरसती/रहेगी मेरी प्यासी/झुलसती धरती/पाने को दो बूंद/हमदर्दी की’’ तो दूसरी ओर मध्यमवर्गीय निर्दोष डाॅ0 पंकज नारंग की जघन्य हत्या की अनकही, अनसुनी पीड़ा से उसका हृदय व्यथित है – ‘‘नहीं है मेरी पीड़ा का कोई गणित, कोई व्याकरण/नहीं लिखे जाएंगे मुझ पर कोई ग्रन्थ, कहानी, उपन्यास।’’ घायल मक्का-मदीना की कराहटें, लाशों का दस्तारखान, खून में सनी सिवईयां देख रचनाकार त्राहिमाम् कर उठती है – ‘‘मुझ को मेरी ईद लौटा दे, तुझे कसम है अल्लाह’’ तो काश्मीरी हिन्दुओं का उपेक्षित आर्तनाद ‘‘घर है पर हूँ बंजारा … मैं लाश हूँ चलती फिरती … न कोई नबी न मसीहा’’ उसे भीतर तक भेद जाता है। प्रथम बार किसी संग्रह की कविताएं उस ‘दमित’ वर्ग की आवाज बनी हैं जिसका सत्ता-लोलुप राजनेताओं एवं विचारधारा-प्रतिबद्ध विमर्श में कोई ‘स्पेस’ नहीं हैं। कवयित्री चेतावनी देते हुए कहती है – ‘‘सावधान सूत्रधार! बढ़ रही हैं बागी कुर्सियां/हर दिन हर शो के साथ/एक दिन/छीन रंगमंच/कर देंगी/तुम्हारी निर्लज्ज नौटकी का/अन्तिम अन्त।’’
स्त्री-वर्ग का उत्पीड़न एवं दुर्दशा इस सर्जक के हृदय को तार-तार कर देता है। क्रुद्ध कवयित्री समाज एवं संस्कृति को लताड़ती हैरू ‘‘हम अलज्ज हैं रक्त से रचते/रंगोली/अपनी संस्कृति की’’। गुण्डागर्दी की शिकार ग्रामीण लड़कियां अभिजात्य बुद्धिजीवियों एवं इन्कलाबियों को फटकारती हैं – नहीं औरत क्या/तेरे इस जहान का हिस्साध्या फिर ये इन्कलाब तेरा है फकत किस्सा ?’’ औरत के हक में लड़ना हमारे समय का सबसे पहला व बड़ा ‘एजेण्डा’ बनता है चूंकि ‘‘जंग असली है यहीं और यही जिहाद भी है’’। यदि कोई वर्ग सच में सदियों से पीड़ित है तो वह है स्त्री – ‘‘भाग्य मेरा पर नहीं बदलता/मैं हूँ स्त्री-शाश्वत दलिता!’’
कवयित्री की चिंता है कि हमारे दौर का इतिहास कही अकर्मण्यता का इतिहास न बन कर रह जाए, वह आह्वान करती है ‘सहस्त्रमुखी क्रान्ति का’ किन्तु उसकी क्रांति रक्तपात एवं घृणा की क्रांति न होकर हृदय-परिवर्तन की सकारात्मक क्रांति हैः ‘‘आग उगलना/और कर देना/स्वाह सभी संभावनाएं/मानवता की और मानव कीध् ये सब मुझसेध्कभी न होगा।’’ इस रचना-संसार में तो गूंजती रहती है सूफियों की ‘अनलहक’ की सदाएं। बुद्ध अवतरित होते हैं सब शान्त, शून्य करने को। कवयित्री का जिहाद है – ‘‘आदम को/इंसा करने का’’ और उसके काफिले में शामिल हैं वो लोग जो लड़ते हैं ताकि ‘‘सलामत रहे/इंसान के लड़ने की ताकत/और रहे ज़िंदा/अन्तिम श्वास लेती इन्सानियत’’। बाबा अम्बेडकर, अब्दुल कलाम, अमृता प्रीतम प्रेरणास्त्रोत हैं मानवीय संभावनाओं के। कवयित्री की सीता धरती में समा जाने वाली बेबस पत्नी अथवा माँ नही अपितु ‘जनकी की पुत्री’ है जो वापिस मायके जा कर अपने माता-पिता की अवलम्बन-शक्ति बनती है एंव मिथिला नगरी की जनकल्याणी-पोषिका।
संग्रह की बड़ी उपलब्धि है कविता की अनन्य महत्ता एवं कवि की गरिमा और संजीवनी शक्ति को स्थापित करना। कवि ही बहा सकता है – ‘‘अजस्र, अजेय धारा जीवन की’’ और ‘‘नहीं होती कभी/निःशेष संभावनाएं/कवि की, कविता की’’। अंधकार का पटल चीर कवि को ‘विराट अवतार’ लेना होगा और यह कवि संचालित होगा मानव की सम्पूर्ण समग्र चेतना से ‘‘ नही हूँ मैं दलित, सुर्वण, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक … आस्तिक, नास्तिक/मैं हूँ केवल मैं … एक समूचा समग्र/जीवित स्पन्दित मानव’’ और उसका यह ‘मानवीय-तत्व’ अजेय एवं अनश्वर है – ‘‘मैं फिर उग आऊंगा/महका जाऊंगा/मासूम बच्चों की नन्ही नवेली दुनिया/एक अदृश्य खुशबू बनकर’’।
चर्चित काव्य-संकलन हमारे नींदें उड़ा देने वाले विस्फोटक, विकराल समय में ख्वाब देखने और दिखाने की बखूबी ‘जुर्रत’ करता है एवं चेतना को विस्तृत करने वाली मानवीय संभावनाएं स्थापित करता है। ‘‘नया शास्त्र/नया समीक्षक/नई दृष्टि/और नूतन मानव’’ को तलाशती, तराशती यह कृति हमारे समय की एक अवश्यपठनीय रचना है।

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