घर-घर में धर्म की स्थापना के लिए बना कानून

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
वर्ष 2007 में भारत की संसद में माता-पिता सहित वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए एक कानून पारित किया। इस नये कानून के उद्देश्यों को लेकर संसद में यह घोषणा की गई कि भारतीय समाज की परम्पराओं और मूल्यों में परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की हर सम्भव सेवा को महत्त्वपूर्ण माना गया है, परन्तु संयुक्त परिवारों की टूटती व्यवस्था के कारण बहुत बड़ी संख्या में वरिष्ठ सदस्यों की देखभाल उचित प्रकार से नहीं हो पा रही। परिणामस्वरूप अनेकों वरिष्ठ सदस्य, विशेष रूप से बुजुर्ग महिलाएँ, जीवन के अन्तिम पड़ाव में भावनात्मक उदासी के साथ-साथ भौतिक और वित्तीय सुखों से वंचित दिखाई दे रहे हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि आज के युग में बुढ़ापा एक बहुत बड़ी सामाजिक चुनौती बन चुकी है। इसलिए इस अवस्था में जीने वाले नागरिकों की सेवा और सुरक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हालांकि परिवार के बुजुर्ग और माता-पिता आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा-125 के अन्तर्गत भी भरण-पोषण खर्च प्राप्त करने के अधिकारी हैं, परन्तु वो प्रक्रिया सामान्य कानूनी प्रक्रिया की तरह बहुत खर्चीली और लम्बा समय लेने वाली होती है। इसलिए एक सरल, कम खर्चीली और तेज गति से कार्य करने वाली प्रक्रिया की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संसद ने उक्त कानून पारित किया।
वरिष्ठ नागरिक कानून के अन्तर्गत बच्चों से अभिप्राय पुत्र, पुत्री, सुपौत्र और सुपौत्री से है, परन्तु इसमें अवयस्क बच्चों को शामिल नहीं किया गया। माता-पिता की परिभाषा में पैदा करने वाले माता-पिता के साथ सौतेले माता-पिता को भी शामिल किया गया है। माता-पिता की परिभाषा में यह भी कहा गया है कि माता-पिता वरिष्ठ नागरिक अर्थात् 60 वर्ष की आयु से कम के भी हों तो भी उन्हें इस कानून के सभी अधिकार प्राप्त होंगे। माता-पिता के कल्याण में भोजन, स्वास्थ्य सुविधा, मनोरंजन तथा जीवन के लिए आवश्यक अन्य सभी सुविधाएँ शामिल हैं।
कर्नाटक राज्य में मैसूर शहर की एक विधवा माँ का एक विवाहित बेटा और एक विवाहित बेटी थी। इस परिवार के पास तीन मकान थे। पारिवारिक बंटवारे में विधवा माँ ने तीनों सम्पत्तियों को बेटे-बेटी और अपने हिस्से के रूप में एक-एक सम्पत्ति देने को स्वीकृति प्रदान कर दी। बंटवारे के समय विवाहित बेटी ने माँ को अपने साथ रहने के लिए तैयार किया और एक महीने के अन्दर ही माँ के हिस्से वाले मकान को भी अपने नाम करवा लिया। यह हस्तान्तरण एक भेंट की तरह विधिवत सम्पन्न हो गया। इसके कुछ माह के बाद बेटी के रंग बदलने प्रारम्भ हो गये। लम्बा समय प्रताड़ना सहने के बाद माँ ने लगभग दो वर्ष बाद वरिष्ठ नागरिक कानून की शरण ली और इस कानून की धारा-23 के अन्तर्गत अपने हिस्से की सम्पत्ति बेटी को भेंट देने की प्रक्रिया को निरस्त कराने की प्रार्थना की।
वरिष्ठ नागरिक कानून की धारा-23 में यह व्यवस्था है कि जब कोई वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों के नाम कोई सम्पत्ति हस्तांतरित कर देता है और बाद में यदि उसे जीवन की मूल सुविधाएँ आदि प्राप्त नहीं होती तो उसके द्वारा किया गया सम्पत्ति हस्तांतरण अवैध घोषित किया जा सकता है। इस कानून में प्रत्येक राज्य के प्रत्येक जिले में वरिष्ठ नागरिक प्राधिकरण स्थापित हैं। अधिकतर राज्यों में जिला आयुक्त के अधीनस्थ अधिकारियों को ही प्राधिकरण के अधिकार दिये गये हैं। माँ की प्रार्थना पर जब वरिष्ठ नागरिक प्राधिकरण के अधिकारी ने सम्पत्ति हस्तांतरण को अवैध घोषित कर दिया तो बेटी ने इस प्राधिकरण अधिकारी के उच्चाधिकारी के समक्ष अपील प्रस्तुत की। अपील के स्तर पर कानून में यह व्यवस्था है कि धारा-16 के अनुसार अपील का अधिकार केवल वरिष्ठ नागरिकों को दिया गया है। बच्चों के लिए तो प्राधिकरण का आदेश ही धरती का अन्तिम आदेश माना जायेगा। परन्तु सब प्रावधानों से बेपरवाह बेटी की अपील भी रद्द हो जाने के बाद बेटी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय का द्वार खटखटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अब बच्चों की कलाकारी देखो, वकीलों को हजारों रुपये खर्च के देने अच्छे लग रहे हैं क्योंकि वकीलों के झूठे आश्वासन उन्हें यह सब्जबाग दिखाते हैं कि सम्पत्ति आपको अवश्य मिलेगी। इससे अच्छी यही होता कि वकालत पर खर्च करने वाली बड़ी-बड़ी राशियों के स्थान पर छोटी-छोटी राशियाँ प्रतिमाह अपनी माँ के चरणों में ही भेंट कर दी गई होती तो शायद इस कानूनी भाग-दौड़ की आवश्यकता ही न पड़ती।
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री बी. वीरप्पा ने बेटी की इस याचिका को निराधार मानते हुए रद्द तो कर दिया, लेकिन साथ ही अनेकों महत्त्वपूर्ण उपदेश भी अपने आदेश मे समाहित कर दिये। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि हृदयरहित बेटों और बेटियों के लिए यह उचित समय है कि उन्हें समझ लेना चाहिए कि जीवन का अर्थ प्रतिक्रिया, और पुनर्ध्वनि है। जो कुछ वे अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं वही कार्य आने वाले समय में उनके साथ भी होने निश्चित हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई, उनके सामाजिक स्तर और सम्पत्तियों को कोई लाभ नहीं होना क्योंकि इन सबसे उनकी किश्मत सुधर नहीं सकती। जब दिमाग में अपने माता-पिता के प्रति ही बुरे विचार आने प्रारम्भ हो जायेें तो पढ़ाई-लिखाई, बुद्धिमत्ता, सामाजिक शक्तियाँ और सम्पत्तियाँ सब व्यर्थ सी दिखाई देने लगती हैं। माता-पिता से बढ़कर कोई दूसरे महान देवी-देवता नहीं हो सकते। दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं और क्रोध से बढ़कर कोई पाप नहीं। न्यायालय ने मनुस्मृति के उपदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति 100 वर्ष में भी अपने माता-पिता के उन कष्टों का ऋण नहीं चुका सकता जो उन्होंने बच्चों के जन्म और पालन-पोषण के समय उठाये होंगे। इसलिए सदैव अपने माता-पिता की खुशी को ही सबसे बड़ा धर्म समझना चाहिए। यही धर्म फलदाई होगा।
अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य बच्चों को सजा देना नहीं अपितु माता-पिता को संरक्षण देने का है। इस कानून के अन्तर्गत सोच-समझकर हर प्रक्रिया को अत्यन्त सरल और बिना खर्च के निर्धारित किया गया है जिससे माता-पिता कोई न्याय प्राप्त करने में जरा सा भी कष्ट न हो। इस कानून के अन्तर्गत गठित प्राधिकरण, अपील अधिकारी और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय माता-पिता के प्रति होने वाले अन्याय की घटनाओं के सामने मूक दर्शक बने नहीं रहें। जब माता-पिता का संरक्षण बच्चों के द्वारा नहीं हो पाता तो धर्म की रक्षा के लिए इस कानून में अधिकार प्राप्त अधिकारी ही उनके संरक्षक की तरह कार्य करते हैं। यह कानून एक प्रकार से गीता में श्रीकृष्ण जी के द्वारा की गई उस घोषणा की तरह लगता है जिसमें कहा गया है जब-जब भी धर्म असुरक्षित होता है तो मैं बुराईयों का दमन करने और धर्म की स्थापना के लिए सामने आता हूँ। इसलिए इस कानून को भी उसी प्रकार धर्म की स्थापना का प्रयास समझा जाना चाहिए जो माता-पिता के प्रति बच्चों के धर्म को स्थापित करने के लिए भारत की संसद ने वर्ष-2007 में बनाया था।

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