गवाहों के संरक्षण की योजना

-विमल वधावन योगाचार्य 
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
जापान की न्याय प्रणाली सारे विश्व में सर्वोत्तम मानी जाती है। आपराधिक मामलों से सम्बन्धित जितने भी मुकदमें अदालतों में पहुँचते हैं उनमें से लगभग 99 प्रतिशत लोगों को सजा सुनाई जाती है। यह एक तथ्य सिद्ध करता है कि मुकदमों की छानबीन, गवाहों से पूछताछ और गवाही के दस्तावेज आदि तैयार करने का कार्य जापान की पुलिस पूरी ईमानदारी और दक्षता के साथ करती है। पुलिस की ईमानदारी के बल पर ही अदालतों में न्यायाधीशों को भी ईमानदारी से कार्य करना ही पड़ता है। हमारे देश में आपराधिक जगत पूरी तरह दुर्दशा का शिकार है। दुर्दशा की यह सारी व्यवस्था पुलिस के भ्रष्टाचार पर ही टिकी है। भारत की पुलिस अपराधियों के साथ सांठ-गांठ करके छानबीन में अनेकों कमियाँ छोड़ती है, मुकदमों को कमजोर बनाती है। परिणामस्वरूप न्यायाधीशों को मजबूर होकर संदेह का लाभ देते हुए अपराधियों को आरोपमुक्त घोषित करना पड़ता है। भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की दुर्दशा यहाँ तक पहुँच चुकी है कि भारत की अदालतों में जितने भी मुकदमें पहुँचते हैं उनमें से लगभग 40 प्रतिशत लोगों को ही सजा सुनाई जाती है जबकि 60 प्रतिशत लोग आरोपमुक्त घोषित हो जाते हैं।
इतनी बड़ी संख्या में अपराधियों के आरोपमुक्त घोषित होने के पीछे गवाहों के मन में अपनी सुरक्षा को लेकर भय की भावना भी एक बहुत बड़ी कमी है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान कई बार आकृष्ट हुआ है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘गवाह संरक्षण योजना’ घोषित करते हुए केन्द्र सरकार तथा सभी राज्य सरकारों को इस योजना के क्रियान्वयन के लिए निर्देश जारी किये हैं। भारत में बहुत बड़ी संख्या में अपराधों के प्रत्यक्ष गवाह अपराधियों के डर के कारण या तो गवाही देने अदालत तक पहुँचते ही नहीं और यदि पहुँच भी जायें तो अपनी गवाही से मुकर जाते हैं। आपराधिक न्याय व्यवस्था में गवाह को अदालत की आँखें और कान कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि न्यायाधीश गवाह की नजरों से ही किसी मुकदमें के तथ्यों को सुनता और देखता है। वास्तव में यह ‘गवाह संरक्षण योजना’ भारत के गृह मंत्रालय ने बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की थी। इस योजना के अनुसार गवाह के परिचय को गुप्त रखने का प्रावधान है। अदालत के समक्ष गवाह का वक्तव्य लिखे जाते समय गवाह को अपराधी व्यक्ति के सामने खड़ा नहीं होना पड़ेगा। गवाही लिखने की प्रक्रिया कैमरे में रिकाॅर्ड की जायेगी। इस योजना के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक जिले का जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा जिले का पुलिस उच्चाधिकारी एक ऐसी समिति के सदस्य होंगे जो किसी भी गवाह या उसके परिवार के सदस्य अथवा मित्र की ऐसी प्रार्थनाओं पर विचार करेगी जिनमें अपराधियों से खतरे की आशंका व्यक्त की जाये। ऐसे गवाहों को समुचित संरक्षण दिया जायेगा। गवाहों को संरक्षण देने से सम्बन्धित प्रार्थना पत्रों पर छानबीन सहित पूरी कार्यवाही पांच दिन के भीतर करनी होगी। इस योजना के अन्तर्गत गवाहों के संरक्षण के लिए एक कोष का निर्माण भी किया जायेगा जो उन्हें संरक्षण देने में होने वाले खर्च की व्यवस्था जुटायेगा। संरक्षण में एक निश्चित अवधि के लिए गवाह को पुलिस सुरक्षा से लेकर उसे टेलीफोन से प्राप्त होने वाली सूचनाओं आदि पर निगरानी की जायेगी तथा संदेहास्पद परिस्थितियों में तुरन्त कार्यवाही प्रारम्भ होगी। गवाह के घर के आस-पास भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने का प्रावधान इस योजना में है। यहाँ तक कि गवाह को अदालत जाने और आने के लिए भी समुचित सुरक्षा प्रबन्ध उपलब्ध कराये जायेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा इस योजना के क्रियान्वयन का निर्देश देने के साथ-साथ अब सरकारों की भी यह जिम्मेदारी बन गई है कि वे इस सारी व्यवस्था को विधिवत एक कानून की तरह स्थापित करने का प्रयास करें। अधिकतर गम्भीर अपराधों में शामिल अपराधी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राजनीतिक व्यवस्थाओं से जुड़े ही होते हैं। वैसे तो अब राजनीति में उच्च पदस्थ जनप्रतिनिधियों में भी अपराधी प्रवृत्ति वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में राजनीति के कर्णधार इस प्रकार की योजनाओं पर विधिवत कोई कानून बनायेंगे, इसकी उम्मीद बहुत अधिक दिखाई नहीं देती।
गवाहों को सुरक्षा देने का विषय पहले भी कई हिन्दी तथा अन्य क्षेत्रीय फिल्मों में दिखाई देता रहा है। हाल ही में तैयार ‘बम्बायरिया’ फिल्म में तो विशेष रूप से अपराधिक मामलों में गवाहों की सुरक्षा ही केन्द्रीय विचार दिखाई दिया है। इस फिल्म को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दिल्ली में कानून विशेषज्ञों के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें फिल्म जारी होने से पहले ही कानूनी विशेषज्ञों को फिल्म दिखाई गई। यह कार्यक्रम केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के द्वारा तथा अतिरिक्त साॅलीसिटर जनरल पिंकी आनन्द के सहयोग से आयोजित किया गया। सरकार द्वारा इस फिल्म के प्रचार में रुचि दिखाना यह सिद्ध करता है कि अब केन्द्र सरकार शायद इस विषय पर कानून के निर्माण में भी शीघ्र कोई कदम उठायेगी। फिल्म निर्देशक ने इस फिल्म के निर्माण के पीछे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि सरेआम होने वाले अपराधों में सब कुछ देखने के बावजूद लोग किस प्रकार किनारा कर लेते हैं। समाज में इस प्रकार डरे सहमे नागरिकों के कारण ही अपराध लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि सरकारें और न्यायालय गवाह संरक्षण योजना को सच्चे मन से लागू करने में सफल हो गये तो निश्चय ही भारत में अपराधियों को उनकी उचित जगह दिखाने की प्रक्रिया मजबूत बन सकती है।

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