अपराध पीड़ितों के कल्याण मार्ग का शुभारम्भ

-विमल वधावन योगाचार्य, एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री रामचन्द्रन ने हाल ही में टी.वी. थाॅमस नामक एक निर्णय में अपराध पीड़ितों को लेकर गम्भीर विचार व्यक्त करते हुए यह व्यवस्था जारी की थी कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया के दौरान अपराध पीड़ितों को केवल बाहरी तत्त्व नहीं समझना चाहिए। अपराध पीड़ितों को अपराध से जुड़ी सारी न्यायिक प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण और समान हितों का व्यक्ति मानना चाहिए। सारे संसार में अब अपराध पीड़ितों को उनके विरुद्ध हुए अपराध के साथ जोड़कर उनके हितों के संरक्षण के प्रयास किये जा रहे हैं।
न्यायमूर्ति श्री रामचन्द्रन ने यह विश्वास व्यक्त किया कि अपराध पीड़ित के लिए अपराध की छानबीन, मुकदमा तथा अपराधी को दी जाने वाली सजा सभी में रुचि लेने का अधिकार है और इन सभी कार्यों में अपने प्रभावशाली विचार व्यक्त करने का भी अधिकार है। सामान्यतः अपराध पीड़ितों को अब तक न्याय प्रणाली में एक अधीनस्थ दर्जे का व्यक्ति माना जाता था। परन्तु समय के बदलाव के साथ-साथ अब अपराध पीड़ितों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। न्याय प्रक्रिया से जुड़े प्रत्येक अंग को अपराध पीड़ितों की आवश्यकताएँ, उनके विचार और यहाँ तक कि उनके मन में बैठे हुए डर और भविष्य के प्रति भय को भी समझना चाहिए और उसे न्याय प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए। छानबीन के दौरान या मुकदमों के चलते पीड़ितों को भी सम्मान के साथ सुना जाना चाहिए। अपराध पीड़ितों को अपराध के दुःखों से उभरने में हर प्रकार की सहायता भी की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति श्री रामचन्द्रन की इन टिप्पणियों के बाद केरल के पुलिस विभाग के मुखिया श्री लोकनाथ बहेरा, डी.जी.पी. ने 21 अक्टूबर, 2017 को जारी एक सार्वजनिक परिपत्र में केरल पुलिस के सभी अधिकारियों को यह निर्देश जारी किया है कि अपराध पीड़ित व्यक्तियों और परिवारों के साथ उचित प्रकार से न्याय करने हेतु अपराध पीड़ित सम्पर्क अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। उन्होंने इस परिपत्र में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री रामचन्द्रन की टिप्पणियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रयासों का भी उल्लेख किया है जिनमें आपराधिक न्याय प्रक्रिया में व्यापक सुधार लाने की बाते कही गई है।
इस परिपत्र के द्वारा केरल के डी.जी.पी. ने केरल राज्य के अन्तर्गत सभी पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश जारी किया है कि हत्या, बलात्कार या अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों पर अत्याचार की घटनाओं में पुलिस को अपराध पीड़ित परिवारों से लगातार सम्पर्क बनाये रखना चाहिए। परन्तु अब उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद पुलिस के लिए सभी अन्य गम्भीर अपराधों विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में पीड़ित परिवारों के साथ सम्पर्क और उनके कल्याण के प्रयास अनिवार्य कर दिये गये हैं। परिपत्र में माता-पिता की देखरेख, मोटरवाहन दुर्घटनाओं में मृतक परिवारों तथा चिकित्सकों की लापरवाही से होने वाली मृत्यु के मामलों में पुलिस को पीड़ित परिवारों के साथ लगातार सम्पर्क करके उनके कल्याण के प्रयास करने चाहिए। पुलिस ज्यादतियों के शिकार परिवार के लोगों के साथ पुलिस को हमदर्दी के साथ व्यवहार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त गवाहों के संरक्षण के प्रयास भी गम्भीरता पूर्वक किये जाने चाहिए। पुलिस को यह भी निर्देश दिये गये हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के निपुन सक्सेना निर्णय (2017) के अनुसार कामुक शोषण की शिकार महिलाओं के लिए उचित मुआवजे की व्यवस्था करवाना भी पुलिस का कत्र्तव्य है।
केरल डी.जी.पी. ने सख्त भाषा में केरल के सभी पुलिस अधिकारियों को इस परिपत्र के द्वारा जागृत करने का प्रयास किया है। पुलिस अधिकारियों को यह चेतावनी भी दे दी गई है कि उनके लिए इस परिपत्र के सभी निर्देश अनिवार्य रूप से पालन करने योग्य हैं। पुलिस अधिकारियों की सहायता के लिए केरल के पुलिस स्टेशनों के स्तर पर पीड़ित सम्पर्क अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी प्रारम्भ कर दी गई है। पीड़ित सम्पर्क अधिकारी के विरुद्ध यदि कोई शिकायत आयेगी तो पुलिस के उच्चाधिकारी उसकी छानबीन करेंगे। इन सम्पर्क अधिकारियों को अपराध पीड़ितों के साथ किसी प्रकार से दुरव्यवहार की अनुमति नहीं दी जायेगी। सभी मुकदमों में इनके क्रिया-कलापों की नियमित छानबीन होगी। इनका कार्य पुलिस छानबीन और मुकदमें के निर्णय तक लगातार पीड़ित परिवार के साथ संतोषजनक सम्पर्क बनाये रखने का होगा।
केरल डी.जी.पी. ने उच्च न्यायालय के एक निर्णय में व्यक्त भावनाओं के प्रति बहुत अच्छी तरह से क्रियात्मक संवेदनशीलता दिखाते हुए एक ऐसा काम कर दिखाया है जो आने वाले समय में सभी राज्यों के पुलिस विभागों के लिए एक प्रेरणादायक कार्य सिद्ध होगा। वैसे तो पुलिस विभाग राज्य सरकारों के अधीन होता है परन्तु केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह जी को भी इस प्रयास की सराहना करते हुए सभी राज्यों के गृहमंत्रियों को अपने-अपने राज्यों में अपराध पीड़ित परिवारों के साथ सम्पर्क करने के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना चाहिए।

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