इतना हिंसक तो नहीं था दलित समाज

-रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार
एससी-एसटी एक्ट में बदलाव पर देशभर में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के संगठनों ने गहरी नाराजगी जताई और सोमवार को भारत बंद का आह्वान किया था। देश में किसी भी जाति, समुदाय के लोगो ने दलित समुदाय द्वारा आयोजित बन्द का विरोध नहीं किया था। लेकिन दलित समुदाय की ओर से आयोजित भारत बंद हिंसक प्रदर्शन में तब्दील हो गया जिसमें आठ लोगों की मौत हो गयी। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं। आंदोलन से सबसे ज्यादा प्रभावित मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, गुजरात व झारखंड रहे।
देश के 12 राज्यों में बंद का असर खास तौर पर देखा गया और सबसे ज्यादा हिंसा उन राज्यों में देखने को मिली, जहां इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह मुद्दा अब राजनीति रुप भी ले चुका है। कई राजनीतिक पार्टिया इस एक्ट का विरोध कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है। अब अगर शिकायत मिलती है तो तुरन्त मुकद्दमा दर्ज नहीं होगा। शिकायत की जांच सात दिन में डीएसपी लेवल के पुलिस अफसर द्वारा की जाएगी। इसके अलावा यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरूपयोग करता है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी। सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। अब अगर एससीध्एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए, तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्रवाई के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा।
इससे पहले एससीध्एसटी एक्ट में जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरन्त मामला दर्ज होता था। ऐसे मामलों में जांच केवल इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर ही करते थे। इन मामलों में केस दर्ज होने के बाद तुरन्त गिरफ्तारी का भी प्रावधान था। इस तरह के मामलों में अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी। सिर्फ हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकती थी। इसके इलावा सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होती थी। यहां तक कि एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होती थी।
देश में एससी/एसटी की आबादी करीबन 20 करोड़ है और लोकसभा में दलित वर्ग के 131 सांसद हैं। भाजपा के सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं। इस बड़े वर्ग से जुड़े इस मामले से हर दल के अपने हित छुपे हैं। इसी वजह से कांग्रेस समेत बड़े विपक्षी दलों ने उसके आंदोलन को समर्थन दिया। इस साल के आखिर में तीन राज्यो में विधानसभा चुनाव होने हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा की कुल 230 सीटों में से एससी की 35 व एसटी के लिए 47 कुल 82 सीट रिजर्व हैं। राजस्थान विधानसभा की 200 सीट में से एससी की 33 और एसटी की 25 कुल 58 सीट रिजर्व हैं। छतीसगढ़ में 90 सीटो में से एससी के लिए 10 और एसटी के लिए 29 कुल 39 सीटें रिजर्व हैं। अगर देखा जाए तो तीनो ही राज्यो में करीब आधी सीटों पर एससीध्एसटी का असर है। इस कारण सभी राजनीतिक दलो का प्रयास होगा की दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिये उनके सबसे बड़े हितैषी बन कर उनकी सहानुभूति हासिल करें।
संविधान का अनुच्छेद 334 के प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व हो जाती हैं। विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक होने के उपरान्त भी उनको अपनी मांगो के लिये सड़को पर उग्र आन्दोलन क्यों करना पड़ता है। ये दलित सांसद अपने समुदाय के लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं। दलित उत्पीडन की इन घटनाओं के खिलाफ दलित सांसदों या विधायकों ने कितनी बार संसद या विधानसभा ठप्प की है। आन्ध्र प्रदेश के कुछ मुट्ठीभर सांसद अपनी मांगो को लेकर जब संसद को नहीं चलने देते हैं तो फिर दलित सांसदो की संख्या तो बहुत अधिक है। अगर एससी और एसटी के सभी सांसद चाह लें तो संसद में इससे कई गुना ज्यादा असर पैदा कर सकते हैं। लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं है।
सुप्रिम कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दल केन्द्र सरकार को कोस रहें हैं। केन्द्र सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि उसको दलितो के हितो की कोई चिन्ता नहीं है। भाजपा धीरे-धीरे आरक्षण को समाप्त करना चाहती है। लेकिन यह सब कहने वाले लोग इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि केन्द्र में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने दलित हितो के लिये अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में संशोधन कर और अधिक प्रभावशाली बनाया था। नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद 2015 में एक संशोधन लाकर इस कानून को सख्त बनाया था। इसके तहत विशेष कोर्ट बनाने और तय समय सीमा के अंदर सुनवाई पूरी करने जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं। 2016 को गणतंत्र दिवस के दिन से संशोधित एससी-एसटी कानून लागू किया गया था।
सुप्रिम कोर्ट के फैसले में एक और गंभीर समस्या है। यह कानून संसद ने पारित किया है। देश में संसद ही कानून बनाती है। कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता है। न्यायपालिका को कानून की समीक्षा करने का हक है कानून बनाने का नहीं। संसद द्वारा पारित एससी-एसटी एक्ट में संशोधन करने का अधिकार भी संसद का ही है। केन्द्र सरकार ने सुप्रिम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। केन्द्रीय कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद ने दलित वर्ग को विश्वास दिलाया है कि सरकार किसी भी हालत में इस कानून को कमजोर नहीं होने देगी।
दलित वर्ग को भी चाहिये कि 2 अप्रैल के भारत बन्द के दिन उनके समाज के कुछ लोगो ने हिंसक प्रदर्शन कर जनधन का नुकसान किया था। उससे उनके समाज की छवी देश भर में खराब हुयी है। दलित समाज वर्षों से दबा कुचला रहने के उपरान्त भी प्रतिशोधस्वरूप कभी हिंसक नहीं बना। दलितो की छवी शान्त प्रकृति की मानी जाती रही है। ऐसे में अचानक इतना हिंसक होने के पीछे लोग राजनीतिक दलो का उकसाना मान रहें हैं। चूंकि सरकार ने दलित समाज के खिलाफ कोई गलत कार्यवाही नहीं की है, ऐसे में सरकार के विरूद्व गुस्सा किस बात का? सरकार का पूरा प्रयास रहेगा कि सुप्रिम कोर्ट अपने फसले पर पुनर्विचार कर कानून को पूर्ववत बनाये रखे। अब मामला सुप्रिम कोर्ट में है। सुप्रिम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुये कहा है कि हम इस कानून के खिलाफ नहीं हैं। अब सुप्रिम कोर्ट का फैसला आने के बाद ही सरकार आगे की कार्यवाही कर सकेगी। जब तक कोर्ट सरकार की पुनर्विचार याचिका पर अपना अन्तिम फैसला नहीं सुना देता है तब तक दलित संगठनो को सुप्रिम कोर्ट के फैसले का शान्ति से इन्तजार करना चाहिये।

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