निःशुल्क कानूनी सहायता – एक मूल अधिकार

-विमल वधावन योगाचार्य
एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट
कानून के प्रावधान, उनकी भाषा और व्याख्या को समझना सामान्य व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए जब भी कोई कानूनी वाद-विवाद अदालत के समक्ष प्रस्तुत होता है तो दोनों पक्ष अपने-अपने विश्वास के वकील के माध्यम से अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं। किसी भी नियम-कानून की व्याख्या करते हुए एक दक्ष व्यक्ति ही अपने पक्ष में उनका लाभ उठाने का प्रयास कर सकता है। इसलिए अदालतों में विवाद आते ही प्रत्येक पक्षकार अपने लिए अधिक से अधिक दक्ष वकील की सेवाएँ लेने का प्रयास करता है। यह दक्षता का एक न्यायोचित स्वरूप है। दूसरी तरफ जिस वकील की प्रसिद्धि अधिक दक्ष व्यक्ति के रूप में हो जाती है वह वकील स्वाभाविक रूप से अपनी सेवा के बदले फीस भी अधिक मांगने लगता है। अधिक दक्षता कभी-कभी सामान्य प्रसिद्धि के सहारे एक मुखौटा भी बन जाती है जिसमें एक प्रसिद्ध वकील न्यायाधीशों के साथ मेल-जोल के माध्यम से भी अपने ग्राहकों के पक्ष में निर्णय कराने वाले वकील के रूप में जाना जाता है। यह दक्षता का एक भ्रष्टाचारी स्वरूप है। इस प्रकार दक्षता के इस खेल में वही लोग फायदा उठाते दिखाई देते हैं जो अधिक से अधिक फीस देकर प्रसिद्ध वकीलों की सेवाएँ प्राप्त कर लेते हैं। जबकि गरीब, अनपढ़ या असहाय लोग न्याय प्रक्रिया के नाम पर चलने वाले इस अनुचित दाँव-पेंच को समझ ही नहीं पाते। ऐसे लोगों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता का प्रावधान सरकार का दायित्व बन जाता है। भारत में यह व्यवस्था सारे देश के लिए बनाई गई है जिसमें ग्रामीण लोगों, गरीब, अनपढ़, वरिष्ठ नागरिक और महिलाएँ अपंग लोग, नशे के चक्रव्यूह में फंसे लोग, जेलों में बन्द ऐसे लोग जिनके लिए कानूनी सहायता का प्रबन्ध करने वाला बाहर कोई न हो आदि निःशुल्क कानूनी सहायता के हकदार हैं।
निःशुल्क कानूनी सहायता के पीछे मूल सिद्धान्त यह है कि न्याय प्रणाली में धन के प्रभाव की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। न्याय को धन के समान नहीं माना जा सकता। व्यक्ति के पास यदि धन कम हो तो भी वह अपने जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति कर ही लेता है। किसी के पास धन न भी हो तो वह भी भिक्षा, दान आदि के सहारे जीवन जी सकता है। परन्तु यदि किसी व्यक्ति के साथ लगातार अन्याय होता जाये और गरीबी के कारण वह उस अन्याय के विरुद्ध आवाज न उठा पाये तो वास्तव में यह एक अमानवीय अवस्था होगी जो किसी भी समाज या देश के लिए चुनौती समझी जायेगी। ऐसा समाज या देश विश्व में एक सभ्य देश कहलाने का हकदार नहीं हो सकता। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय छवि की भी यह माँग है कि प्रत्येक देश में न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया सबके लिए समान हो।
न्याय के समान अधिकारों को लागू करने के लिए भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय से लेकर निचली अदालतों तक में प्रत्येक सरकार द्वारा निःशुल्क कानूनी सहायता के लिए समितियाँ गठित की गई हैं। निःशुल्क कानूनी सहायता का प्रबन्ध करने के पीछे बहुत महान उद्देश्य थे। 1973 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री कृष्णा अय्यर ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि कानून गरीबों के साथ भी उतना ही जुड़ा हुआ हो जितना अमीरों के लिए। इसी संदर्भ में उन्होंने जनहित याचिकाओं का भी उल्लेख किया था। अन्ततः संसद के एक कानून के द्वारा राष्ट्रीय कानूनी सहायता अधिकरण की स्थापना की गई। इस संस्था के लिए अनेकों महान कार्यों की सूची घोषित कर दी गई। इस कानून की धारा-4 में इसके अनेकों कार्यों का उल्लेख किया गया है। जैसे – उपभोक्ता संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामाजिक न्याय के रूप में कार्य करना, ग्रामीण क्षेत्रों, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों और श्रमिकों के बीच कानूनी सहायता कैम्प आयोजित करना, लोक अदालतों के माध्यम से मुकदमों का सहमति के आधार पर निर्णय करवाना, वादी-प्रतिवादी के बीच मध्यस्तता का प्रबन्ध करना, संविधान में वर्णित मूल कत्र्तव्यों के प्रति भारतीय जनमानस को जागरूक करना, गरीबों और असहाय लोगों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराना, राज्यों और जिला प्रशासनों के अतिरिक्त स्वयं सेवी संस्थाओं को भी ऐसे कार्यों को करने पर धन की सहायता देना, बाॅर काॅउंसिल तथा कानून के शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर कानूनी शिक्षा का प्रचार करना।
कानून के रूप में इतनी बड़ी व्यवस्था का गठन तो हो गया परन्तु धरातल पर यह व्यवस्था लोक अदालतों और मध्यस्तता केन्द्रों के कार्य में ही सबसे अधिक उलझी हुई दिखाई देती है क्योंकि इन कार्यों से अदालतों का बोझ कुछ कम होता हुआ दिखाई देता है। निःशुल्क कानूनी सहायता इस व्यवस्था का मूल कार्य था। यह कार्य बड़े-बड़े शहरों या बड़ी अदालतों में तो दिखाई देता है परन्तु भारत की सैकड़ों जिला अदालतें और हजारों तहसील स्तर पर चलने वाली अदालतों में निःशुल्क कानूनी सहायता का शायद लोगों ने कभी नाम भी न सुना हो। लोगों के अतिरिक्त जिला अदालतों से नीचे कार्य करने वाले अनेकों न्यायाधीश भी निःशुल्क कानूनी सहायता के महत्त्व और आवश्यकता से परिचित नहीं हैं। जबकि निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा दिये गये जीवन जीने के अधिकार का अंग बन चुका है। निःशुल्क कानूनी सहायता तन्त्र का गठन भी संविधान के अनुच्छेद-39(क) के अन्तर्गत किया गया था जिसमें न्याय के लिए सबको समान अवसर का सिद्धान्त घोषित किया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय कई ऐसे निर्णय भी जारी कर चुका है जिनमें यदि निचली अदालतों किसी गरीब या अनपढ़ व्यक्ति को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध न करवाई गई हो तो उसके विरुद्ध किये गये निर्णयों को अवैध घोषित कर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय को निःशुल्क कानूनी सहायता तन्त्र पर निगरानी का दायरा बढ़ाना चाहिए। देश के प्रत्येक जिले और उससे नीचे की एक-एक अदालत से यह विवरण मंगवाया जाना चाहिए कि उनके पास निःशुल्क कानूनी सहायता की कैसी व्यवस्था उपलब्ध है और उसका कितना उपयोग किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय देश की सभी छोटी-बड़ी अदालतों को यह निर्देश भी जारी कर सकता है कि यदि किसी मुकदमें में गरीब, अनपढ़ या अन्य असहाय लोग बिना वकील की सहायता के दिखाई दें तो उन्हें सरकार की तरफ से वकील की सुविधाएँ उपलब्ध कराना प्रत्येक न्यायाधीश का प्रमुख दायित्व होना चाहिए। इस कार्य में लापरवाही करने वाले न्यायाधीशों के विरुद्ध भी कार्यवाही का प्रावधान लागू किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की इस निगरानी प्रक्रिया के प्रारम्भ होते ही निःशुल्क कानूनी सहायता के वास्तविक प्रयासों में तेजी आ सकती है।

 

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