मीडिया समूहों को अदालत की नसीहत

-विमल वधावन योगाचार्य
एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट
जब भी किसी महिला पर अत्याचार की घटना सामने आती है तो ऐसा लगता है कि सारा समाज पूरी हमदर्दी और भावुक संवेदनाओं के साथ पीड़ित महिला की स्थिति पर विलाप कर रहा है। अखबारों, टी.वी. चैनलों, इण्टरनेट पर सक्रिय सोशल मीडिया आदि सभी चिन्ता के आंसू बहाते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन समस्त देशवासी और सभी सरकारें कभी इस बात पर चिन्तन करते हुए दिखाई नहीं दिये कि महिलाओं के प्रति अपराध ही क्या किसी भी अपराध के सम्बन्ध में हम अपने छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक को ऐसा कौन सा पाठ पढ़ा रहे हैं जिससे हम अपनी वर्तमान और भविष्य की सन्तानों के मन में अपराधी प्रवृत्ति को पनपने से रोकने का प्रयास करते हुए दिखाई दें।
भारत के एक बालक ने बचपन में राजा हरिश्चन्द्र के जीवन पर आधारित एक फिल्म देखने के बाद यह संकल्प लिया कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की फिल्में देखने वाले ही सत्य का संकल्प ले सकते हैं। सत्य के साथ-साथ ईश्वर के प्रति समर्पण अर्थात् हर अवस्था में ईश्वर को स्मरण रखना और अपने अहंकार भाव को कभी भी बढ़ने न देना। ऐसे लक्षण नैतिकता के लक्षण कहे जाते हैं। परन्तु यह निश्चित है कि हमारे जीवन में जो भी लक्षण दिखाई देते हैं वे हमारे वातावरण के माध्यम से ही हमारे मन और बुद्धि का निर्माण करते हैं।
इसके विपरीत आज के युग में बनने वाली फिल्में, अखबारें, टी.वी. चैनल, इण्टरनेट आदि पर चारों तरफ सैक्स और हिंसा के अतिरिक्त भ्रष्टाचारी राजनीति ही दिखाई देती है। इसलिए ऐसे वातावरण में जीने वाले लोगों में ऐसे ही लक्षण पैदा होने की सम्भावनाएँ रहेंगी। जब सारे समाज में अनैतिकता से भरी घटनाओं का प्रचार होगा तो समाज के सदस्यों से कैसे आशा की जा सकती है कि वे अपराधरहित लक्षणों को धारण करें।
फिर भी अपराध, अपराध ही है। अपराध को कभी कोई पसन्द नहीं कर सकता। समाज का वही प्रचार तन्त्र जो सैक्स हिंसा और भ्रष्टाचार का प्रचार करता फिरता है, महिलाओं के विरुद्ध अपराध को लेकर घड़ियाली आंसू बहाना शुरू कर देता है। इन घड़ियाली आंसुओं में भी तमाशा देखने के भाव दिखाई देते हैं।
13 अप्रैल, 2018 के दिन दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुश्री गीता मित्तल तथा श्री सी. हरिशंकर की खण्डपीठ ने अदालत की सुनवाई शुरू करने से पूर्व अपने आप ही कुछ अखबारों और टी.वी. चैनलों में जम्मू कश्मीर के कठुआ गैंग रेप और हत्या से सम्बन्धित समाचारों में पीड़िता के चित्र तथा पारिवारिक विवरण दिखाये जाने को लेकर देश के अनेकों टी.वी. चैनलों और अखबार समूहों को नोटिस जारी कर दिये। एन.डी. टी.वी., इण्डिया टी.वी., द वीक, फस्ट पोस्ट, दक्कन क्रोनिकल, नव-भारत टाइम्स, पायनीर, इण्डियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन, द हिन्दू, टाइम्स आॅफ इण्डिया, आॅन लाइन मीडिया सर्विस आदि के साथ-साथ न्यायालय ने केन्द्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग तथा दिल्ली महिला आयोग जैसी सरकारी संस्थाओं को भी नोटिस जारी कर दिया, क्योंकि इन सरकारी संस्थाओं ने भी ऐसी गैर-कानूनी हरकत को रोकने का कोई संज्ञान नहीं लिया था। यह पहला अवसर था जब बड़े-बड़े मीडिया समूहों को किसी गैर-कानूनी गतिविधि के कारण न्यायिक प्रक्रिया के शिकंजे में कसने का प्रयास किया गया हो। उस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय इस घटना को लेकर बहुत गम्भीर लग रही थी। अन्ततः इन सभी मीडिया समूहों पर 10-10 लाख रुपये का जुर्माना घोषित कर दिया गया। सभी मीडिया समूहों द्वारा यह राशि जम्मू कश्मीर राज्य के उस कोष में जमा करवाई जायेगी जिससे कामुक अपराध पीड़ितों की सहायता की जाती है।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा-228ए के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि जब भी किसी बलात्कार पीड़ित महिला की पहचान को उजागर करने से सम्बन्धित प्रयास करेगा उसे दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई जा सकती है। इस प्रावधान का सीधा अर्थ यह है कि जुर्माने के साथ-साथ कारावास की सजा भी दी जाती है। सम्भवतः यह सजा इसलिए नहीं दी गई कि लगभग सभी मीडिया समूहों ने बिना किसी शर्त के अदालत के समक्ष क्षमा याचना कर दी।
मीडिया समूहों ने दिल्ली उच्च न्यायालय को यह भी आश्वासन दिया कि वे ऐसे कानूनों से सम्बन्धित प्रावधानों का व्यापक प्रचार करेंगे जिससे भविष्य में कोई भी पत्रकार या प्रकाशक पीड़िता की पहचान को उजागर करने का प्रयास न कर सकें।
हालांकि मीडिया समूहों की तरफ से यह दलील प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया था कि पीड़िता की पहचान का प्रचार करने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि वे अपराधियों का उचित प्रकार से दण्ड प्रक्रिया में शामिल होना सुनिश्चित कर सकें। इसके अतिरिक्त एक निरर्थक दलील यह भी दी गई कि पीड़िता जीवित नहीं है इसलिए उसकी पहचान को उजागर करना उसके लिए हानिकारक नहीं होगा। परन्तु अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।
महिलाओं के प्रति अपराधों से सम्बन्धित आंकड़ों का अध्ययन करने से अक्सर यह तथ्य सुना जाता है कि महिलाओं के साथ छेड़खानी और यहाँ तक कि बलात्कार के जितने भी मुकदमें पुलिस और अदालतों के समक्ष रिपोर्ट किये जाते हैं, वास्तव में कई गुना अधिक ऐसे अपराध भी होते हैं जो पुलिस और अदालतों तक पहुँच ही नहीं पाते। इसका सीधा कारण यही होता है कि महिलाएँ अपने प्रति घटित अपराधों को रिपोर्ट करने से डरती हैं क्योंकि पुलिस और अदालतों में मामले पहुँचने के बाद उनकी और अधिक बदनामी होगी। जबकि इस बदनामी से रोकने के लिए कानूनी प्रावधान पहले से ही बनाकर रखे गये हैं। अब दिल्ली उच्च न्यायालय की इस बड़ी कार्यवाही के बाद मीडिया से जुड़े सभी लोग इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे कि किसी भी कामुक अपराध से पीड़ित महिला का नाम, चित्र तथा अन्य परिचय प्रचार का विषय न बनाया जाये।
पुनः समाज के अपराधीकरण के मूल कारणों पर आते हुए देश की अदालतों से ही यह आशा की जा सकती है कि वे मीडिया को सकारात्मक प्रचार का मार्ग दिखायें जिसमें नैतिकता से जुड़ी घटनाएँ, रचनात्मक और कला-कौशल के विकास की घटनाएँ तथा सामाजिक कल्याण और परोपकार जैसे कार्यों के प्रचार में ही अपनी व्यवस्थाओं का प्रयोग करें। मीडिया समूहों को स्वतः ही अपने विवेक से नकारात्मक प्रचार की गतिविधियों पर एक सीमा के बाद प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

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