मजदूरों को प्रवासी नहीं भारतवासी कहो

-रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार(झुंझुनू, राजस्थान)

पिछले दो माह से देश में चल रही तालाबंदी (लाकडाउन) के कारण पूरा देश रुका हुआ है। सभी व्यवसायिक गतिविधियां ठप्प पड़ी है व कल कारखाने बंद है। लंबी तालाबंदी के चलते लोगों के सामने रोजी – रोटी का संकट पैदा हो गया है। ऐसे में अपने घरों से दूर देश के दूसरे प्रांतों में रोजगार के लिए गए लोग अपने घर वापसी कर रहे हैं। भारी संख्या में लोग एक प्रांत से दूसरे प्रांतों में जा रहे हैं। जिससे पूरे देश में अफरा-तफरी मची हुई है। यातायात के समुचित साधन नहीं मिलने के कारण लाखों लोग पैदल ही अपने घरों की तरफ चल पड़े हैं। सड़कों पर पैदल ही भूखे, नंगे पैर चलते लोगो की खबरें, फोटो समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में दिखायी जा रही है। जिसके चलते केन्द्र व सभी राज्यों की सरकार कटघरे में खड़ी हुई है।
विभिन्न प्रदेशों में काम करने वाले मजदूरों का काम धंधा बंद होने के बाद सरकार ने उनको जहां है वहीं रुकने को कहा था। साथ ही सरकार ने उन्हे आश्वस्त भी किया था कि उनके रहने व खाने की समुचित व्यवस्थाएं राज्य सरकारों द्वारा की जाएगी। मगर सरकारें ऐसा करने में विफल रही। विभिन्न स्थानों पर रुके हुए मजदूर अपने को फंसा हुआ मानने लगे। क्योंकि उनके पास जमा पूंजी समाप्त हो गई व उनके भूखे मरने की नौबत आने लगी। ऐसे में भयावह होती परिस्थितियों से डरकर लोगों ने अपने घर जाना ही बेहतर समझा।
देश भर में जगह-जगह मजदूरों ने सरकारी अधिकारियों से घर भेजने की गुहार लगायी मगर उनकी नहीं सुनी गई। तब थक हार कर परेशान मजदूर पैदल ही अपने घरों की तरफ निकल पड़े। सड़कों पर लाखों मजदूरों के पैदल चलने के दौरान अनेकों जगह सड़क हादसे हुए जिनमें सैकड़ों मजदूर मारे गए। इससे केंद्र व राज्य सरकारों की बदनामी होने लगी। अपनी बदनामी से डरकर केंद्र व राज्य सरकारों ने एक मई से मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए श्रमिक विशेष रेल सेवा प्रारंभ की। जिसके माध्यम से अब तक देश के 30 लाख से अधिक मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाया जा चुका है। मगर सरकार ने रेल सेवा प्रारंभ करने में 40 दिन लगा दिए थे। जिस कारण मजदूरों ने पैदल ही अपने घर की राह पकड़ ली।
सरकार यदि तालाबंदी के कुछ दिनों बाद ही श्रमिक विशेष रेलगाड़ियां शुरु कर देती तो मजदूरों को पूरे देश में इस तरह दर बदर नहीं होना पड़ता और ना ही उन्हें सड़कों की पैदल खाक छाननी पड़ती। सैकड़ों मजदूरों को जान भी नहीं गंवानी पड़ती। मगर आज भी देश में लाखों की संख्या में ऐसे मजदूर हैं जो दूसरे प्रांतों में फंसे पड़े हैं। अपने घर जाने के लिये उनको साधन नहीं मिल पाए हैं। सरकार को ऐसे सभी लोगों को जल्दी से जल्दी उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि उनको संकट से छुटकारा मिल सके।
तालाबंदी के दौरान देश में लाखों मजदूर दूसरे प्रांतों से अपने घरों की तरफ लौट रहे थे इस दौरान उनके लिए प्रवासी मजदूर शब्द का प्रयोग किया जा रहा है जो गलत व अनुचित है। प्रवासी का अर्थ है परदेश में रहने वाला। अपनी रोजी रोटी के लिए दूसरे प्रांतों में काम कर रहे ये मजदूर प्रवासी नहीं बल्कि भारतवासी है। कुछ लागों ने भारत के गांव से निकले कामगारों को प्रवासी बना डाला है। इनका भी पूरे देश पर उतना ही अधिकार है जितना अन्य संपन्न लोगों का है। देश के अन्य प्रांतों से अपने घरों की ओर लौट रहे मजदूरों को प्रवासी मजदूर कहने वालों को अपने शब्दों पर गौर करना चाहिए। उनको पता होना चाहिए कि प्रवासी का मतलब होता है ऐसे भारतीय जो दूसरे देशों में रहकर वहां अपना जीवन यापन करते हैं।
अगर एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर काम करने वाले प्रवासी हैं तो देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, तमाम दलों के नेता, प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों, पुलिस, सेना, सहित देश भर में अलग अलग राज्यों से आ कर सेवा देने वालों के लिए कौन सा शब्द प्रयोग करेंगे। देश के भीतर किसी को भी प्रवासी कहना गलत है। जो लोग इन कामगारों को प्रवासी कह रहे हैं उनको अपने बारे में बताना होगा कि वे क्या हैं ? दिल्ली में विभिन्न राज्यों में जितने भी लोग कार्यरत हैं क्या वो खुद भी प्रवासी की श्रेणी में नहीं आ जाते हैं।
दूसरे प्रांतों से लौटने वाले मजदूर तो कहीं विदेश में भी नहीं रहते हैं। यह तो अपने ही देश में अपने परिवार के साथ अपने गांव में रहते है। अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए ये लोग दूसरे प्रांतों में जाकर मेहनत मजदूरी करते हैं। ऐसे लोगों को प्रवासी कहना कहीं से न्यायोचित नहीं लगता है। चूंकि पर प्रांतों में मजदूरी करने वाले यह लोग इतने गरीब व दबे कुचले होते हैं कि इन्हें अपने अधिकारों का भी पूर्णतया ज्ञान नहीं होता है। इसलिए उन्होंने प्रवासी मजदूर कहे जाने का कहीं विरोध नहीं किया।
देश के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी तबके को राष्ट्र निर्माण के लिए दूसरे प्रांतों में जाकर ईमानदारी से मेहनत मजदूरी करने वाले मजदूरों को प्रवासी कहना शोभा नहीं देता है। दूसरे प्रांतों में काम करने वाले गरीब लोगों को वहां की सरकारों को भी संरक्षण देना चाहिए। वहां के लोगों को भी उनकी पूरी मदद करनी चाहिए क्योंकि इनकी मेहनत व खून पसीने के बल पर ही उन प्रदेशों के बड़े-बड़े कल कारखाने, उद्योग धंधे चलते हैं। जिनकी बदौलत प्रांत तरक्की करते हैं। आज देश में सबसे बुरे हाल में मजदूर वर्ग है। इनके पास न तो कोई स्थाई रोजगार है ना ही इनको सही ढंग से कोई सरकारी सहायता मिल पाती है। मजदूरों के लिए यदि सरकार कोई सुविधा प्रदान भी करती है तो वह बिचैलियों के हत्थे चढ़ जाती है। मजदूरों का दामन तो अंत तक खाली ही रहता है।
तालाबंदी के दौरान जनता ने देखा है कि हमारे देश के मजदूर कितनी बदहाल जिंदगी जी रहे हैं। महानगरों से अपने घरों की तरफ पैदल जा रहे मजदूरों के पास न तो पहनने की चप्पल थी ना ही ढंग के कपड़े ना ही खाने-पीने के साधन। मात्र कुछ दिनों की तालाबंदी ने ही देश के मजदूरों को सड़क पर ला दिया। इससे हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि हमारे देश के मजदूरों की स्थिति बहुत दयनीय है। वह हर दिन कमाकर हर दिन खाने की स्थिति में है। उनके पास इतनी भी क्षमता नहीं है कि वह घर बैठकर एक माह तक अपना गुजारा कर सके।
अब समय आ गया है कि देश की सरकार को गंभीरतापूर्वक देश के गरीब तबके के भले के लिए सोचना चाहिए तथा ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए जिससे देश का गरीब तबका भी हर दिन आसानी से भरपेट भोजन कर सके व आवश्यकता की सुविधायें हासिल कर सके। हालांकि केंद्र सरकार ने एक देश एक राशन कार्ड की योजना बनाई है। जिसका देश के लोगों को बहुत फायदा मिलेगा। सरकार को देश के सभी गरीब लोगों के लिए रियायती दर पर राशन व सभी के लिए निशुल्क चिकित्सा की सुविधा अवश्य ही उपलब्ध करवानी चाहिए। उसमें कहीं किसी सरकारी नियम कानून की अड़चन नहीं आनी चाहिए।
देश के हर गांव में आज भी ऐसे सैकड़ों परिवार मिलेंगे जो वास्तविक रूप से गरीब होने के बावजूद भी उनको रियायती दर पर राशन सामग्री नहीं मिल पा रही है। ना ही उन्हें स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ मिल पा रहा है। केंद्र व राज्यों की सरकारों को अपने बजट का सर्वाधिक हिस्सा देश की इस बड़ी गरीब आबादी के विकास के लिए खर्च करना चाहिए। देश का मजदूर वर्ग सुखी रहेगा तभी देश तरक्की करेगा व आगे बढ़ सकेगा।

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