कांग्रेस में आगे लाना होगा युवा नेतृत्व

-रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार (झुंझुनू, राजस्थान)

कांग्रेस पार्टी अभी भी इस बात को नहीं समझ पा रही है कि आज उसके लिए समय बदल गया है। कभी देश पर एकछत्र राज करने वाले कांग्रेस पार्टी का आधार सिमट चुका है। कांग्रेस के नेताओं को इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा। कांग्रेस के नेता जितनी जल्दी इस सत्य को स्वीकार करेंगे उतना ही कांग्रेस के लिए अच्छा होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस के प्रभाव में लगातार कमी आती जा रही है। 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस पार्टी एक-एक कर देश के कई प्रदेशों में भी सत्ता से बाहर हो चुकी है। कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज नेता चुनाव में शिकस्त खा चुके हैं। मगर फिर भी कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता अपने पुराने रवैया पर ही अड़े नजर आते हैं। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी की सलाहकार मंडली में शामिल अधिकांश नेता वृद्ध हो चुके हैं तथा शारीरिक रूप से भाग दौड़ करने में सक्षम नहीं है। लेकिन फिर भी वह बड़े पदों पर जमे हुए हैं। नए नेताओं के लिए पद छोड़ने को तैयार नहीं है। हाल ही में संपन्न हो रहे कई राज्यों के राज्य सभा चुनाव में भी कांग्रेस के पुराने नेताओं का ही दबदबा देखा गया है।
पिछले लोकसभा चुनाव में हार चुके कांग्रेस के बुजुर्ग नेता मलिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस पार्टी ने फिर से राज्यसभा में भेज दिया है। जबकि उनका बेटा प्रियंक खड़गे भी कर्नाटक में विधायक है तथा कुमार स्वामी की सरकार में मंत्री भी रह चुका है। मलिकार्जुन खड़गे के मुकाबले भाजपा ने कर्नाटक में विद्यार्थी परिषद से जुड़े जिला स्तर के दो अनजान लोगों को राज्यसभा की टिकट दी है। कर्नाटक में कांग्रेस यदि मल्लिकार्जुन खड़गे की बजाए किसी नए युवा नेता को राज्यसभा में भेजती तो पार्टी को आगे चलकर काफी फायदा मिलता। मगर सोनिया गांधी के सलाहकारों ने खड़गे को ही राज्यसभा में भेजना उपयुक्त समझा।
कांग्रेस ने मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह व चम्बल क्षेत्र के बड़े दलित नेता फूलसिंह बरैया को प्रत्याशी बनाया है। मगर हाल ही में घटे राजनीतिक घटना चक्र के चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस एक सीट पर ही जीत सकती है। ऐसे में पार्टी वहां दिग्विजय सिंह की बजाय फूलसिंह बरैया को राज्यसभा में प्रथम वरीयता के वोट दिलवाकर विजय बनाती है तो उसका लाभ आगे होने वाले 24 विधानसभा सीटो के उपचुनाव में मिल सकता है। फूलसिंह बरैया दलित नेता है जो चम्बल संभाग से आते हैं। ऐसे में उनके राज्यसभा में जाने से दलित वोटों का कांग्रेस की तरफ रुझान हो सकता है।
दिग्विजय सिंह तो वैसे भी कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचा चुके हैं। गोवा कांग्रेस के प्रभारी रहते कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी होने के उपरांत भी वहां सरकार बनाने से चूक गए थे। मध्यप्रदेश में भी दिग्विजय सिंह के कारण ही तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा करने के कारण ही कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। दिग्विजय सिंह से कांग्रेस को अब नुकसान अधिक है फायदा कम है। समय रहते कांग्रेस में दिग्विजय सिंह को साइडलाइन कर मध्यप्रदेश में कांग्रेस को कमजोर होने से बचा लेना चाहिये।
छत्तीसगढ़ से कांग्रेस ने वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी को राज्यसभा में भेजा है। इससे पूर्व 2014 में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया था। छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है। 15 साल के लंबे समय के बाद वहां कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई है। ऐसे में वहां कांग्रेस को बाहरी की बजाए स्थानीय लोगों को ज्यादा महत्व देना चाहिए था। हालांकि केटीएस तुलसी बड़े वकील है तथा कांग्रेस के कई बड़े नेता बहुत से मामलों में कोर्ट में फंसे हुए हैं। इसलिए उन्हें बड़े वकीलों की जरूरत है। मगर वोट देकर प्रदेश में सत्तारूढ़ करवाने वाली जनता को भी महत्व दिया जाना जरूरी होना चाहिए।
गुजरात में कांग्रेस ने नेतृत्व के नजदीकी शक्ति सिंह गोहिल व भरत सिंह सोलंकी को मैदान में उतारा है। पहले वहां दिल्ली के जुगाड़ू नेता राजीव शुक्ला को टिकट देने की बात चली थी तो विधायकों ने विरोध कर दिया तब भरत सिंह को टिकट दी गई। वहां जब राज्यसभा उम्मीदवार के फार्म भरे गए थे तब कांग्रेस स्थिति कांग्रेस के पक्ष में लग रही थी। मगर इस दौरान कांग्रेस के 8 विधायकों द्वारा त्यागपत्र दे देने के कारण अब वहां कांग्रेस के एक प्रत्याशी के ही जीतने की संभावनाएं बन रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व वहां प्रथम वरीयता के वोट किस उम्मीदवार को दिलाता है उस पर ही हार जीत का फैसला होगा। वैसे गुजरात कांग्रेस के 65 विधायकों में से बहुमत भरत सिंह सोलंकी के साथ लग रहा है।
राजस्थान में भी राज्यसभा चुनाव को लेकर विधायको की बाड़े बंदी की गयी है। यहां कांग्रेस से राहुल गांधी के चहेते संगठन महासचिव एम वेणुगोपाल एवं नीरज डांगी को प्रत्याशी बनाया गया है। एम वेणुगोपाल जहां कांग्रेस आलाकमान की पसंद के प्रत्याशी है व पार्टी के सबसे पावरफुल महासचिव है। वही नीरज डांगी अशोक गहलोत की पसंद के प्रत्याशी है। कई बार विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनको राज्यसभा टिकट दिलवाई है।
राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के गुट बने हुए हैं। जिनकी गुटबाजी अक्सर खुलकर सामने आती रहती है। राज्यसभा चुनाव में भाजपा द्वारा दो प्रत्याशी उतारे जाने के बाद कांग्रेसी नेताओं में बेचैनी बढ़ गई है। इसी के चलते सुरक्षा की दृष्टि से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस समर्थक सभी विधायकों की एक बड़े सात सितारा होटल में बाड़ेबंदी कर रखी है। जहां खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी मौजूद रहकर उन को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं।
राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी द्वारा कोरोना संकट के समय भी अपने विधायकों को एक भव्य होटल में रखना व उनके आमोद प्रमोद के फोटो सोशल मीडिया में वायरल होने से प्रदेश की जनता में उनके प्रति गलत धारणा बन रही है। लोगों का मानना है कि एक तरफ तो राजस्थान में कोरोना का संक्रमण ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल के सभी विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री होटल में बंद रह कर आमोद प्रमोद, मनोरंजन कर रहे हैं जो संकट के समय आमजन को धोखा देने के समान है।
कांग्रेस आलाकमान को अपने मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व अन्य सभी बड़े पदाधिकारियों में से ऐसे लोगों की छुट्टी कर देनी चाहिए जिनकी आम जन में अच्छी छवि नहीं है। ऐसे पार्टी पदाधिकारी जो मेहनत करने में सक्षम नहीं हो व जिनके बेतुके बोल से पार्टी को नुकसान पहुंच रहा हो व जिनका मतदाताओं पर असर न रहा हो ऐसे नेताओं से पार्टी को किनारा कर लेना चाहिए। इनके स्थान पर नये युवा नेताओं को तरहीज देनी चाहिए।

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