मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तीन तालाक’ की प्रथा का निराकरण है फिल्म ‘फिर उसी मोड़ पर’

– अजय  शास्त्री
यह एक निंदनीय कुरीति है जिसके अंतर्गत कोई भी पति अपनी लाचार और बेबस पत्नी को ‘तालाक-तालाक-तालाक’ कहकर प्रताड़ित करते हुए अपने जीवन से निष्कासित कर सकता है। इस विषय के इतने ज्वलंत रूप धारण करने से पहले ही सुविख्यात महान निर्देशक – लेखक लेख टंडन (प्रोफेसर, आम्रपाली, झुक गया आसमान, जहां प्यार मिले, प्रिंस, आंदोलन, दुल्हन वही जो पिया मन भावे, एक बार कहो, शारदा, अगर तुम ना होते, खुदा कसम, दूसरी दुल्हन, मिल गई मंजिल मुझे, इत्यादि फिल्मों में प्रशंसित) ने इस अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय की गम्भीरता को भांपा और त्वरित गति से उस पर एक निराली फिल्म बनाने की योजना को कार्यन्वित किया। फलस्वरूप एक अनोखी फिल्म ‘फिर उसी मोड़ पर’ का निर्माण कार्य केवल 6 महीनों के अंतराल मे लेख टंडन के पटु, सक्षम और बेजोड़ निर्देशन में सम्पन्न हुआ। दुर्भाग्यवष इस महान निर्देशक – लेखक का 15 अक्टूबर 2017 को स्वर्गारोहण हो गया। परंतु देहावसान के पूर्व लेख जी ‘फिर उसी मोड़ पर’ जैसी महत्वपूर्ण सम्पादित कर पाये। अब यह फिल्म उनके सहयोगी निर्माता त्रिनेत्र/कनिका/अंशुला बाजपेई अपनी संस्था कनिका मल्टीस्कोप प्राइवेट लिमिटेड के (एम पी एल) के अंतर्गत हजारों प्रशंसकों के समक्ष शीघ्र प्रस्तुत करने वाले हैं।
इससे पहले लेखजी ने बिना समय गंवाये अपने चिरपरिचित और विश्वासपात्र अभिनेताओं/ अभिनेत्रियों का चयन किया और महत्वपूर्ण किरदार कँवलजीत सिंह, परमीत सेठी, एस.एम. जहीर, गोविंद नामदेव, स्मिता जयकार, कनिका बाजपेई, राजीव वर्मा, भारत कपूर, अरुण बाली, हैदर अली, विनीता मलिक, संजय बत्रा, दिव्या दिवेदी और नवोदिता नायिका जिविधा आस्था, शिखा इटकान ने जीवित किये। इसके अतिरिक्त लेखजी से वर्षो से जुड़े सक्षम सहयोगियों जैसे जहांगीर चैधरी (छायांकन), माधव क्रिशन/जोजो (नृत्य निर्देशन), अवध नरायण सिंह (सम्पादन), अमीन सयानी, अली पीटर जॉन (प्रचार), सुरेश प्रेमवती बिश्नोई (सह-लेखन/सह-निर्देशन), चोक्कस भरद्वाज (कला निर्देशन ) इत्यादि ने सकुशल कार्यान्व्यन से फिल्म में चार चाँद लगा दिये। फिल्म की कहानी एक सीधी-सीधी और मजलूम महिला, नाज, पर केंद्रित है जिसे उसका बचपन का साथी, शाहिद, धोखे से निकाह करने के बाद तलाक दे देता है। चार महीने की गर्भवती नाज को एक नेक इंसान, रशीद, सहारा देता है और उसके बच्चे को अपना नाम देकर निकाह कर लेता है। इसके बाद रशीद का कैंसर से इंतकाल हो जाता है और हजारों कठिनाइयों के बावजूद नाज अपने बेटे ( रशीद जूनियर ) को पालती और पढ़ाती है। रशीद जूनियर को दुबई मे अच्छी नौकरी मिलती है जहां वो अपनी विदेशी सेक्रेटरी के प्रेम जाल में फंस जाता है और शबनम को तलाक दे देता है। नाज अब ‘फिर उसी मोड़ पर’ है और अपने बेटे की नाइंसाफी और तीन तलाक की कुरीति से जंग छेड़ देती है। आगे पर्दे पर देखिये लेख टंडन की फिल्मों का एक अत्यंत सशक्त पहलू उनका संगीत रहा है। हिंदी फिल्म संगीत के स्व स्वर्णिम युग को पुनर्जीवित करने के लिये ‘फिर उसी मोड़ पर’ का संगीत विख्यात टेक्नोक्रैट और संगीत प्रेमी त्रिनेत्र बाजपेई (राइटर ऑफ दोज माग्निफीसेंट म्यूजिक मारकर) को सौंपा गया जिन्होंने स्वर्गीय नक्श ल्यालपुरी, अहमद वसी, इरशाद कामिल के काव्यात्मक गीतों को सुमधुर/पाश्र्वगायन कनिका बाजपेई और जावेद अली ने किया है। फिल्म का अनूठा संगीत कालजयी होगा और गुजरे जमाने के माधुर्य की वापसी करेगा।
‘फिर उसी मोड़ पर’ फिल्म निश्चय ही फिल्म इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी, जिसका फिल्म की टीम को पूर्ण विशवास है। सशक्त विषय, सक्षम निर्देशन, लुभावने फिल्मांकन, अनूठे प्रस्तुतिकरण और सुमधुर संगीत से सजी फिल्म ‘फिर उसी मोड़ पर’ की प्रबुद्ध दर्शकों को उल्कट प्रतीक्षा है। फिल्म की सफलता स्वर्गीय लेख टंडन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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