वर्टिब्रोप्लास्टी : स्पाइन सर्जरी के लिए नया नॉन-इंवेजिव ट्रीटमेंट

डॉ. अरविंद कुलकर्णी
हेड, मुंबई स्पाइन स्कोलियोसिस एंड डिस्क रिप्लेसमेंट सेंटर, बॉम्बे हॉस्पिटल, मुंबई
मिसेज अंजुम की उम्र 58 वर्ष है और करीब 2 साल से लगातार गंभीर बैक पेन से पीडित हैं। उनका वजन काफी ज्यादा 104 किलो है। वह अनियंत्रित डायबिटीज से भी जूझ रही थीं और पिछले साल गंभीर बीमार हुई थीं। लगातार गंभीर बैक पेन के कारण उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी गई थी। कई डॉक्टर्स को दिखाने के बाद करीब एक साल तक दवाइयां लीं, लेकिन दर्द में सुधार नहीं हुआ। समय बढ़ने के साथ स्थिति और भी खराब होती गई हालत यह हो गई कि उन्हें उठने में भी दिक्कत होने लगी और बिना सपोर्ट के चल पाने में असमर्थता जताने लगीं।
एक्स-रे और एमआरआई की जांच में सामने आया कि जब वह हमारे पास आईं तो उनकी स्पाइन के एल 3 लेवल में फ्रै क्चर था। लेकिन मोटापे और बढ़ती डायबिटीज को ध्यान में रखते हुए ट्रीटमेंट किया गया है जो कि अपने आप में एक बड़ा चैलेंज था। ऐसे में टीम में नॉन इंवेजिव वट्रिबोप्लास्टी स्पाइन सर्जरी करने का फैसला लिया। डायबिटीज को धीरे-धीरे कंट्रोल करके ही इस सर्जरी को करना बेहतर विकल्प था।
लोकल एनेस्थिसिया और लाइट सीडेशन देने के बाद मिनिमल इंवेजिव प्रोजीजर फॉलो किया गया। त्वचा पर दो बारीक छेद स्पेशल डिजाइन वाली नीडिल से किए गए। इस नीडिल को एक्सरे की मदद से वर्टिब्री कॉलम में डाला गया। बोन सीमेंट से बनी पीएमएमए (पॉली मिथाइल मेथ एक्रीलेट) को फ्रै क्चर की जगह पर इंजेक्ट किया गया और कुछ मिनट के लिए छोड़ा गया।
प्रभावित जगह को बोन सीमेंट इंस्टेंट सपोर्ट देती है। यह वर्टिब्रा को मजबूत बनाती है और भविष्य में होने वाले फ्रेक्चर से बचाती है। लोकल एनेस्थिसिया देने के बाद पूरी प्रक्रिया में 20 मिनट से भी कम का समय लगा। 3 घंटे के बाद मरीज पैदल चल सकता था। हाई डायबिटीज के बाद भी कोई कॉम्पिलकेशन और गलत प्रभाव नहीं देखे गए। दर्द भी पूरी तरह से खत्म हो गया था। अगली सुबह उसे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया था। इस प्रक्रिया ने अधिक वजन वाले मरीज में जादू का असर किया था।
क्या है वर्टिब्रोप्लास्टी
भारत मेेें करीब 5 करोड़ से अधिक लोग ऑस्टियोपोरोसिस से परेशान हैं। बढ़ती उम्र के साथ उनमें बोन मिनिरल डेंसिटी भी घट रही है। इस कारण हड्डियों में फ्रैक्चर का रिस्क बढ़ रहा है खासकर स्पाइन में। हालांकि हड्डियों में कमजोरी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन बुजुर्गों में इसके मामले अधिक देखने में आते हैं। कंप्रेशन फ्रैक्चर तब होता है जब स्पाइन की कमजोर हड्डी क्षतिग्रस्त हो जाती है और काफी बैक पेन होता है। जब कई हड्डियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तो लंबाई पर असर पडने के साथ बॉडी पॉश्चर भी प्रभावित होता है। कई मरीजों में, दर्द लगातार होता है क्योंकि लगातार हड्डियां क्षतिग्रस्त होती रहती हैं।
स्पाइन के ज्यादातर फ्रैक्चर को ठीक करने से पहले बैड रेस्ट कराते है ताकि दर्द पूरी तरह से खत्म हो जाए। दर्द निवारक दवाएं, बैक ब्रेसेस और फिजिकल थैरेपी भी दी जा सकती है। कभी-कभी मरीज की स्पाइन को तत्काल बचाने के लिए सर्जरी की जाती है। इसमें बोन ग्राफ्ट या इंटरनल मेटल डिवाइस की मदद ली जाती है। हाल ही नई नॉन-सर्जिकल ट्रीटमेंट का प्रयोग किया गया है जिसे वर्टिब्रोप्लास्टी कहते हैं। यह खासकर उन मरीजों के लिए अच्छा विकल्प है जिन्हें बेड रेस्ट, एनालजेसिक्स और बैक ब्रेसिंग देने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है।
वर्टिब्रोप्लास्टी एक नया नॉन-सर्जिकल टेक्नीक है जिसमें मेडिकल ग्रेड सीमेंट को एक नीडिल के माध्यम से दर्द वाले में हिस्से में इंजेक्ट किया जाता है। इसकी मदद से मरीज अपने रोजमर्रा के काम निपटा सकता है साथ ही एनालजेसिक्स लेने से भी बच सकता है। साथ ही फ्रैक्चर में भी आराम मिलता है। वर्टिब्रोप्लास्टी दर्दवाले और बढ़ रहे बिनाइन ट्यूमर, मेलिग्नेंट जख्म का भी इलाज करते हैं। मल्टीपल मायलोमा, हिमेंजीओम और कई स्पाइनल बोन कैंसर में जहां परंपरागत थैरेपी भी काम नहीं करती ऐसे में वर्टिब्रोप्लास्टी कारगर साबित होती है।
वर्टिब्रोप्लास्टी के बाद कई मरीजों को दर्द से राहत मिली है। ज्यादातर मामलों में इस प्रक्रिया के बाद तत्काल दर्द दूर हुआ और एक ही दिन में मरीज अपने दिनचर्या के काम पर वापस लौट गया।
वर्टिब्रोप्लास्टी काफी सेफ है। क्षतिग्रस्त हड्डियों को जोडने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बोन सीमेंट काफी सेफ है। अगर आपको हड्डी टूटने (ऑस्टियोपोरोटिक फ्रैक्चर वर्टिब्रा) के बाद काफी बैक पेन हो रहा है तो दो हफ्तों का बेड रेस्ट, दर्दनिवारक दवाएं लेने की जरूरत नहीं है। ऐसे में वर्टिब्रोप्लास्टी कराई जा सकती है। पुराने फ्रैक्चर के मुकाबले हाल ही हुए फ्रैक्चर को वर्टिब्रोप्लास्टी से जल्दी ही ठीक किया जा सकता है। हालांकि पुराने फ्रैक्चर को भी सफलतापूर्वक ठीक किया जा सकता है। ऑस्टियोपोरोटिक फ्रैक्चर इस प्रक्रिया सफलता दर 90-95 प्रतिशत है। एग्रेसिव हिमेंजीओम्स का भी वर्टिब्रोप्लास्टी से इलाज संभव है। साथ ही मैलिग्नेंट पैथोजेनिक फ्रैक्चर में भी राहत मिल सकती है।
वर्टिब्रोप्लास्टी के फायदे
दर्द में कमी
वर्टिब्रोप्लास्टी से दर्द कम होता है। कुछ मामलों में तो दर्द निवारक दवाओं की भी जरूरत नहीं होती है। यह मरीज को सामान्य स्थिति में ले आता है।
कार्यक्षमता बढ़ाता
वर्टिब्रोप्लास्टी फ्रैक्चर में राहत देकर दर्द कम करता है और रोजमर्रा की एक्टिविटी करने के लिए तैयार करता है।
भविष्य में होने वाली टूट-फूट से बचाव
ऑस्टियोपोरोसिस और स्ट्रेंथनिंग के दौरान हड्डियों के बीच में हुई जगह को भरने के लिए सीमेंट का इस्तेमाल होता है। जिससे भविष्य में फ्रैक्चर होने की आशंका कम हो जाती है।
संक्रमण का खतरा नहीं
पूरी प्रक्रिया में मात्र 3 एमएम का चीरा लगता है जो जल्द ही भर जाता है और संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
बेहोशी का कोई प्रभाव नहीं
इस प्रक्रिया के दौरान एनेस्थीसिया दिया जाता है जिसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
डे-केयर प्रोसीजर
यह प्रक्रिया काफी कम समय में की जाती है जिसमें 30 मिनट से भी कम समय लगता है। क्योंकि सीमेंट जल्द ही सख्त हो जाती है और दर्द भी कम हो जाता है। जल्द ही मरीज चलने-फिरने लायक हो जाता है और उसी दिन घर जा सकता है।

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