‘धैर्य’ और ‘सब्र’ रखना सिखाता है रमजान का पहला रोजा

इस्लाम धर्म में रोजा (सूरज निकलने के कुछ वक्त पहले से सूरज के अस्त होने तक कुछ भी नहीं खाना-पीना यानी निर्जल-निराहार रहना) बहुत अहमियत रखता है। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया के हर धर्म यानी मजहब में उपवास/रोजा प्रचलित है। इस्लाम मजहब में रोजा, मजहब का स्तंभ भी है और रूह का सुकून भी। रोजा रखना हर मुसलमान पर फर्ज है। अरबी जबान (भाषा) का सौम या स्याम लफ्ज ही दरअसल रोजा है। सौम या स्याम का संस्कृत/हिन्दी में मतलब होगा ‘धैर्य’। इस तरह अरबी जबान का सौम या स्याम ही हिन्दी/संस्कृत में संयम है। इस तरह रोजे का मतलब हुआ सौम या स्याम यानी ‘धैर्य’ यानी रोजा ‘धैर्य’ और ‘सब्र’ सिखाता है। पहला रोजा ईमान की पहल है।
सुबह सेहरी करके दिनभर कुछ न खाना-पीना या सोते रहकर शाम को इफ्तार करने का नाम रोजा नहीं है। यानी रोजा सिर्फ भूख-प्यास पर संयम या कंट्रोल का नाम नहीं है। बल्कि हर किस्म की बुराई पर नियंत्रण/धैर्य यानी कंट्रोल का नाम है। सेहरी से रोजा आरंभ होता है। नीयत से पुख्ता होता है। इफ्तार से पूर्ण (मुकम्मल) होता है।
रोजा खुद ही रखना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अमीर और मालदार लोग धन खर्च करके किसी गरीब से रोजा रखवा लेते। वैज्ञानिक दृष्टि से रोजा स्वास्थ्य यानी सेहत के लिए मुनासिब है। मजहबी नजरिए से रोजा रूह की सफाई है। रूहानी नजरिए से रोजा ईमान की गहराई है। सामाजिक नजरिए से रोजा इंसान की अच्छाई है।

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