जन भावनाओं को समझे कांग्रेस

-रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार (झुंझुनू, राजस्थान)

भारत व चीन के बीच सीमा पर युद्ध के हालात बने हुए हैं। पिछली 15 जून को दोनों देशों की सेना आपस में टकरा चुकी है। जिसमें भारत के 20 वीर सैनिक शहीद हुए हैं। वहीं चीन के भी काफी सैनिक मारे जाने की सूचनाएं मिल रही है। सीमा पर शांति बनाये रखने के लिए भारत व चीन के सेना अधिकारियों की तीन बैठके हो चुकी है। लेकिन अभी तक कोई सार्थक हल नहीं निकल पाया है। लद्दाख में सीमा के पास भारत व चीन हथियारों के साथ बड़ी संख्या में सैनिको का जमावड़ा कर रहें है।
ऐसे में भारत के लोगों में चीन के प्रति जबरदस्त गुस्सा देखा जा रहा है। देश के सभी राष्ट्रभक्त लोग चाहते हैं कि भारत इस बार चीन से मुकाबला कर उसको सबक सिखा दे। ताकि बार-बार सीमा पर विवाद उत्पन्न होने का झंझट ही समाप्त हो जाए। भारत की सेना भी चीन से युद्ध करने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही है। युद्ध के हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने तीनों सेनाओं को आपातकाल स्थिति में 500 करोड़ रुपए तक के हथियार खरीदने के अधिकार दे दिए हैं। केंद्र सरकार ने इस बार सेना को युद्ध लड़ने की खुली छूट भी प्रदान कर दी है। मौजूदा संकट काल में कांग्रेस नेताओं द्धारा दिये जा रहे बयानो से लगता है कि वो चीन को सपोर्ट कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चीन संकट को लेकर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी व पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सवालों के माध्यम से घेरना चाहा। जब से सीमा पर चीन संकट उत्पन्न हुआ है तब से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी लगातार केन्द्र सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। राहुल गांधी हर दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नित नए आरोप लगा रहे हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा आहूत सर्वदलीय बैठक में जहां विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं ने एक सुर में केंद्र सरकार का पूरा साथ देने की बात कही थी। वही कांग्रेस नेताओं द्वारा अलग सुर आलापे जाने के कारण कांग्रेस पार्टी अलग-थलग पड़ती नजर आ रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए गए आरोप के जवाब में कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र सरकार में सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने भी कांग्रेस को लताड़ लगाते हुए कहा कि राष्ट्रीय हितों के मामलों में संकीर्ण राजनीति नहीं करनी चाहिए। शरद पवार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हर बात खुले मंच पर नहीं बताई जा सकती है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो। जब राष्ट्रीय हित की बात हो तो सभी दलों को एक सुर में सरकार के साथ खड़े नजर आना चाहिए।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते 1962 में चीन द्वारा भारतीय जमीन पर किए गए कब्जे को याद दिलाते हुए शरद पवार ने कहा कि यह भूला नहीं जा सकता कि चीन ने हमारी 45 हजार वर्ग किलोमीटर की भूमि पर अतिक्रमण कर लिया था। हमें पिछली बातों को भी याद रखने की जरूरत है। कट्टर मोदी विरोधी ममता बनर्जी ने भी राष्ट्रहित के मुद्दे पर चीन के खिलाफ एक स्वर में मोदी सरकार का साथ देने की बात कही। बसपा प्रमुख मायावती, अन्नाद्रुमक नेता व तमिलनाड़ू के मुख्यमंत्री एके पलानीस्वामी, द्रुमक अध्यक्ष एमके स्टालिन, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. केशव राव सहित सभी बड़े दलों के नेताओं ने पूरी एकजुटता के साथ केंद्र सरकार का साथ देने की बात कही है।
कांग्रेस आलाकमान के सलाहकार इस बात को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि राष्ट्र के समक्ष संकट के समय कांग्रेस नेताओं द्वारा हर दिन सरकार विरोधी बयान देने से देश की जनता की नजर में कांग्रेस की छवि खराब होती जा रही है। 2014 से लेकर अब तक कांग्रेस के सभी नेता देश की जनता का मूड भापने में नाकामयाब रहे हैं। जिसका खामियाजा कांग्रेस पार्टी को 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ा है। अपने सबसे कमजोर प्रदर्शन के बाद भी कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं के विवादित बयानों के चलते आम जनता से कटती जा रही है। आज पूरे देश के लोग सेना का मनोबल बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के नेताओं द्वारा सेना पर अंगुली उठाना लोगों को रास नहीं आ रहा है।
इससे पूर्व भी सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ किए गए सन्य ऑपरेशनो पर भी कांग्रेसी नेताओं ने जमकर सवाल उठाए थे। कई कांग्रेसी नेताओं ने तो सेना के उन अभियानों को पाकिस्तान से मिलीभगत तक करार दे दिया था। प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में भी कांग्रेस प्रभाव दिखा पाने में नाकाम रही है। राफेल विमान खरीद प्रकरण, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाना, तीन तलाक बिल, राम मंदिर जैसे मुद्दों पर भी कांग्रेस पार्टी अपने से जुड़े उन विपक्षी दलों को भी अपने साथ एकजुट नहीं रख पाई जो यूपीए का हिस्सा है। ज्यादातर मौकों पर कांग्रेस अकेले ही खड़ी नजर आती है। संसद में भी कई बार कांग्रेस को अपने साथी विपक्षी दलों का साथ नहीं मिला जिससे वह अकेली पड़ गई।
यह बात किसी के समझ में नहीं आ रही है कि कांग्रेस के नेता आखिर क्या चाहते हैं। कांग्रेस नेता क्यों जानबूझकर आत्मघाती बयान देते रहते हैं। राहुल गांधी के चारों तरफ ऐसे सलाहकारों ने घेरा बना रखा है जो उनको वास्तविकता तक पहुंचने ही नहीं देते हैं। राहुल गांधी के सलाहकार अक्सर उनसे ऐसे बयान दिला देते हैं। जिससे वह खुद ही लोगों के निशाने पर आ जाते हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के बाद सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी सही ढंग से विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है। कांग्रेस के नेताओं द्वारा समय पर सही फैसला नहीं लेने का खामियाजा उनको केंद्र व राज्यों में लगातार हार के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
देश में सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी पर आज एक परिवार की निजी पार्टी होने का ठप्पा लग रहा है। जो कांग्रेस की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रहा है। कांग्रेस द्धारा जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के मुद्दे पर सरकार का विरोध करने से नाराज होकर उस समय राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक भुवनेश्वर कलिता ने व्हिप जारी करने से ही मना कर दिया था। कांग्रेस की पार्टी लाइन से नाराज होकर उन्होने उसी समय राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था। जिससे संसद में कांग्रेस की बड़ी किरकिरी हुयी थी।
कांग्रेस आलाकमान की उपेक्षा से नाराज होकर ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक 22 विधायकों के साथ कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। जिसके चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई। महाराष्ट्र में भी शिवसेना जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ सरकार में शामिल होना कई कांग्रेसी नेताओं को पसंद नहीं आ रहा है। मगर वे मौके की तलाश में है। उन्हें जैसे ही मौका मिलेगा कांग्रेस को बाय-बाय कर जाएंगे।
कांग्रेस आलाकमान को पार्टी के गिरते जनाधार को लेकर पार्टी मंच पर गम्भीरता से चिंतन-मंथन करना होगा। पार्टी में जमीनी स्तर पर काम कर रहे उर्जावान, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहिये। जनहित से जुड़े मुद्धो को लेकर संघर्ष करना चाहिये। संना के खिलाफ बयानबाजी बंद करनी चाहिये। तभी कांग्रेस अपना खोया आधार फिर से हासिल कर सकती है। यदि मौजूदा स्थिति आगे इसी तरह बरकरार रहती है तो आगे आने वाला समय कांग्रेस पार्टी के लिये और अधिक चुनौतिपूर्ण होगा।

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