‘मी टू’ की जगह ‘आई एम स्ट्रांग’ का अभियान चलायें

-विमल वधावन योगाचार्य
(एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट)
अमेरिका की एक अभिनेत्री आलायसा मिलेनो ने अक्टूबर, 2017 में अपने एक साथी के विरुद्ध लिंगभेद व्यवहार से सम्बन्धित आरोप लगाये। यह आरोप किसी ताजा घटना से सम्बन्धित थे इसलिए पुलिस द्वारा छानबीन प्रारम्भ हो गई। यह घटना अमेरिका के स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। इस प्रक्रिया से उत्साहित होकर उस अभिनेत्री ने अन्य महिलाओं को सम्बोधित करते हुए ट्वीट किया कि यदि आपके साथ भी ऐसा हुआ है तो मेरे इस ट्वीट के उत्तर में लिखो ‘मी टू’ अर्थात् ‘मैं भी’। थोड़े से समय में लगभग 70 हजार उत्तर प्राप्त हुए जिसमें केवल ‘मी टू’ ही नहीं अपितु अपने-अपने साथ घटी लिंगभेद, छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटनाओं का उल्लेख भी आने लगा। सोशल मीडिया पर विगत एक वर्ष से भी कम समय में ‘मी टू’ एक बहुत बड़ा अभियान बन गया। भारत में भी इस अभियान के पैर पड़े तो बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों के इतिहास भी उखड़ने लगे। एक अभिनेत्री तन्नुश्री ने अभिनेता नाना पाटेकर के विरुद्ध कामुक शोषण का आरोप लगाया तो दूसरी तरफ लगभग 15 पत्रकार महिलाओं ने एम.जे. अकबर नामक वरिष्ठ पत्रकार पर आरोप लगाये जो भारत सरकार के मंत्री पद पर सुशोभित था और आरोपों के समय अफ्रीका के दौरे पर था। कई अभिनेत्रियों ने अभिनेता आलोकनाथ पर भी 20 वर्ष पुरानी घटनाओं के आरोप सोशल मीडिया पर साझा की है। फिल्म और राजनीति के अतिरिक्त कई प्रसिद्ध उद्योगपति भी इस अभियान में पुरानी घटनाओं के कारण आरोपी बना दिये। इस सामाजिक अभियान से एक कड़वी सच्चाई सामने आ रही है कि समाज का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं है जहाँ महिलाओं को पूरा सुरक्षित वातावरण प्राप्त हो। कुछ अपवादों को छोड़कर पुरुष समाज कामुकता से ग्रसित होता ही है। अपने धन और सत्ता का दुरुपयोग करते हुए वह महिलाओं को तो केवल खेल और मनोरंजन की वस्तु ही समझने लगता है। दूसरी तरफ इसे भी एक सच्चाई की तरह ही स्वीकार करना होगा कि कुछ महिलाएँ भी अपने भविष्य के उत्थान और आधुनिकता की चकाचैंध में पागल होकर अपने चरित्र और गरिमा गौरव को भूल सी जाती हैं। ऐसी समझौतावादी महिलाओं के कारण ही पुरुषों की हिम्मत बढ़ जाती है और वे सभी महिलाओं को उसी मानसिकता के साथ हांकने के लिए तैयार दिखाई देते हैं। इसका सबसे सुन्दर इलाज तो यही हो सकता है कि जब भी महिलाओं के साथ लिंगभेद की कोई छोटी सी छोटी भी घटना हो तो उसकी तुरन्त शिकायत की जानी चाहिए। कार्यस्थलों पर महिलाओं को कामुक शोषण से बचाने के लिए विशेष कानून भी लागू हो चुका है। उस कानून के अनुसार महिलाओं को कई प्रकार की सुरक्षा देने के भी प्रावधान हैं। कामकाजी महिलाओं को इस कानून की विशेष जानकारी होनी चाहिए। प्रबन्धक वर्ग में पुरुषों के साथ-साथ किसी महिला का होना भी अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक कार्यस्थल पर महिलाओं की किसी भी शिकायत से निपटने के लिए एक विशेष महिला समिति का भी होना आवश्यक है।
‘मी टू’ अभियान के माध्यम से जो महिलाएँ कई दशक पुरानी घटनाओं का उल्लेख कर रही हैं, उसका कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। ‘मी टू’ अभियान के नाम पर तो ऐसा लगता है विवादों और मिर्च-मसाले वाले समाचारों का एक नया पिटारा खुल गया है। वास्तव में फायदा होना तो दूर, आरोप लगाने वाली महिलाओं को इसका नुकसान ही होगा। अकबर और आलोकनाथ ने आरोप लगाने वाली महिलाओं के विरुद्ध करोड़ों रुपये के मानहानि मुकदमें अदालतों में प्रस्तुत कर दिये हैं। हो सकता है अन्य आरोपी भी इन आरोपों से पल्ला झाड़ने के लिए ऐसे मुकदमें कर दें। लम्बी अवधि बीत जाने के कारण आरोपी महिलाओं को इन आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करना भी कठिन होगा। इसलिए सोशल मीडिया के इस नये पिटारे में कूदने के स्थान पर प्रत्येक महिला को अब कमर कस लेनी चाहिए कि आज के बाद वे किसी भी कामुक शोषण जैसी लिंगभेद घटनाओं को एक मिनट के लिए भी सहन नहीं करेंगी और इसकी सूचना तत्काल अपने प्रबन्धन वर्ग या पुलिस को देंगी। मुझे ऐसा लगता है कि कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब सारे देश के सभी राज्यों, शहरों और यहाँ तक कि गाँवों में महिलाएँ पुरुषों की कुदृष्टि का शिकार न हो रही हों। परन्तु ऐसी घटनाओं की शिकायतों की संख्या नगण्य सी होती है। यदि तत्काल दर्ज होने वाली शिकायतों की संख्या एक अभियान की तरह बढ़ सके तो यह निश्चित है कि निकट भविष्य में पुरुषों की कामुक प्रवृत्ति पर भी मजबूत लगाम लग सकेगी। ‘मी टू’ अभियान तो केवल मात्र खोये हुए पलों का पिटारा मात्र साबित होगा। इसके अतिरिक्त ‘मी टू’ अभियान आरोप लगाने वाली महिला की लाचारी और कमजोरी भी दिखाता है जिसके कारण वह उसी वक्त अपने विरुद्ध हुई हरकतों की शिकायत नहीं कर सकी। जबकि तत्काल शिकायतों का अभियान वास्तव में महिला सशक्तिकरण का अभियान बन सकता है। महिलाओं को इस अभियान का नाम रखना चाहिए ‘आई एम स्ट्रांग’ अर्थात् ‘मैं बलशाली हूँ’। इस अभियान के तहत जैसे ही कोई महिला कहीं कामुक कुदृष्टि का शिकार हो तो उस घटना को तत्काल पुलिस में सूचित करे और सोशल मीडिया पर ‘आई एम स्ट्रांग’ नामक अभियान के अन्तर्गत साझा करे और अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करे कि ‘आई एम स्ट्रांग’ अभियान के अन्तर्गत किसने क्या कदम उठाया। यह सकारात्मक अभियान होगा जो महिला सशक्तिकरण का मार्ग धरातल पर प्रशस्त करेगा।

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