मूल कर्तव्य बनें एक सरकारी महाक्रांति

-अविनाश राय खन्ना,
उपसभापति, भारतीय रेड क्रास सोसाईटी
भारत के संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का आदर, स्वतंत्रता आन्दोलन को प्रेरित करने वाले राष्ट्रभक्ति के आदर्शों का अनुसरण, भारत की एकता और अखण्डता की रक्षा, राष्ट्रवासियों की सेवा, सभी नागरिकों में भाईचारा स्थापित करना और भेदभाव वाली प्रथाओं का त्याग, स्त्रियों का सम्मान, भारत की संस्कृति और परम्पराओं की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा और प्राणियों के प्रति दयाभाव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद, ज्ञान और सुधारवाद को प्रोत्साहन, सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा और अहिंसा के सिद्धान्त, अपने-अपने क्षेत्र में पारंगत होकर राष्ट्र के विकास में सहयोग, सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाना आदि कुछ ऐसे कर्तव्य हैं जिन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद-51ए में नागरिकों के लिए कुछ मूल कर्तव्य के रूप में घोषित किया गया है।
यह अनुच्छेद संविधान के 42वें संशोधन के माध्यम से वर्ष 1976 में जोड़ा गया जबकि नागरिकों के मूल अधिकार प्रारम्भ से ही भारतीय संविधान में उपलब्ध थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इन मूल कर्तव्यों को सदैव महत्त्वपूर्ण माना है, परन्तु इनके लागू करने की बाध्यता को कभी स्वीकार नहीं किया। मूल कर्तव्य का अर्थ है कि भारत के नागरिकों को कुछ ऐसे दायित्वों का स्मरण करवाना जिनका पालन करना उनके अपने लिए तथा एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, स्वस्थ और जिम्मेदार समाज की रचना के लिए महत्त्वपूर्ण हो। भारत अनेकों प्रकार की परम्पराओं और रीति-रिवाजों से सम्पन्न देश है। यहाँ अनेकों मत-पंथों और विश्वासों को मानने वाले लोग रहते हैं। इतनी व्यापक भिन्नताओं के बावजूद सभी भारतवासी अपने आपको एक राष्ट्रीय संस्कृति से जुड़े हुए महसूस करें, यह तभी सम्भव है जब सभी नागरिकों को मानवतावादी सभ्य समाज की रचना तथा देश की एकता से सम्बन्धित कुछ मुख्य सिद्धान्त मूल कर्तव्यों की तरह समझाये जायें। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही इन मूल कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया।
आज भारतीय नागरिक जब राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का आदर नहीं करते तो सर्वोच्च न्यायालय को तरह-तरह के निर्देश जारी करने पड़ते हैं। जबकि होना यह चाहिए था कि स्वतंत्रता के बाद से भारतीय नागरिकों के मन में इस राष्ट्रीय पहचान का सम्मान करने की भावनाएँ एवं परम्पराएँ विकसित की जाती। अनेकों लोग संविधान और कानून का पालन नहीं करते और भिन्न-भिन्न प्रकार के अपराधों में लिप्त रहते हैं, उसका कारण है कि सरकार और समाज ने नागरिकों के मन में कानून का पालन करने के प्रति लगाव पैदा करने के कोई विशेष प्रयास नहीं किये। जिस प्रकार स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान शहर-शहर और गाँव-गाँव में देशभक्ति का जलजला दिखाई देता था वह आज इसलिए दिखाई नहीं देता कि स्वतंत्रता के बाद हमारी सरकारें नागरिकों को देशभक्ति के कोई विशेष कार्यक्रम नहीं दे पाई। देश में जब भी कहीं प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं और सरकारें सभी नागरिकों से दान-अनुदान, धन और सामग्री की भिक्षा मांगना प्रारम्भ करती हैं तो देखकर मन कितना संतुष्ट होता है कि एक प्रान्त के पीड़ित नागरिकों के लिए देश के कोने-कोने से सहायता सामग्री प्रारम्भ हो जाती है। इतना ही नहीं सात समुद्र पार बसने वाले भारतीय नागरिकों के मन में भी भारतवासियों के दुःखों में भागीदारी की भावनाएँ पनपने लगती हैं। प्रधानमंत्री सहायता कोष जैसे प्रयास भी इन्हीं कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए सारा वर्ष उदारतापूर्वक नागरिकों और संस्थाओं के सहयोग से सिंचित होते रहते हैं।
मानवतावाद के नाम पर तो सारा संसार देश, धर्म आदि की परवाह किये बिना ही सहायता की अपील को अपने कंधों पर ले लेता है। इसी प्रकार भारत की सरकार यदि अपनी संस्कृति, परम्पराओं, पर्यावरण, संरक्षण और प्राणियों के प्रति दयाभाव आदि को लेकर नागरिकों के मन में समय-समय पर मानवतावादी अपीले जारी करती रहे तो कोई कारण नहीं कि हमारा देश और समाज अनेकों समस्याओं के समाधान स्वतः ही पैदा करने लगेगा।
जब भी कभी राजनीतिक या अन्य कारणों से प्रान्तवाद, जातिवाद या सम्प्रदायवाद जैसे विवाद उभरते हैं तो उसका कारण सीधा दिखाई देता है कि हमारी सरकारें भाई-चारे और राष्ट्रीय एकता की भावनाओं को देश के नागरिकों के बीच स्थापित करने में सफल नहीं रह पाई। जब भी किसी महिला के साथ समाज में बदसलूकी या अपराध सुनने को मिलता है उसे भी सरकार की ही विफलता समझा जाता है। सरकार का कार्य केवल अपराधियों को दण्डित करना ही नहीं है अपितु उससे भी पहले सरकार का दायित्व यह होना चाहिए कि महिलाओं के सम्मान की भावनाओं को देश के एक-एक नागरिक के मन और मतिष्क में इस तरह बैठा दिया जाये कि ऐसे सिद्धान्त प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त समझने के लिए मजबूर कर दें। जब हम हड़तालों और आन्दोलनों को हिंसक होते हुए देखते हैं और सरकारी भवनों, बसों आदि को अग्नि के भेंट चढ़ते हुए देखते हैं तो भी हमें सरकार की ही विफलता दिखाई देती है कि हमारी सरकारों ने देश के नागरिकों को सार्वजनिक सम्पत्तियों की सुरक्षा और अहिंसक तरीकों का पाठ नहीं पढ़ाया। हमारी सरकारें देश के नागरिकों के हर दुःख-दर्द में यदि अपने कर्तव्यपालन को पर्याप्त महत्त्व देती और नागरिकों को भी अपनी ऊर्जा, अपनी क्षमताएँ देशहित में विकसित करने की प्रेरणा देती तो शायद सार्वजनिक हिंसा हमारे समाज में देखने को भी न मिलती। गरीबी के कारण जब हम बच्चों को स्कूलों में नहीं अपितु ढाबों में बर्तन साफ करते हुए, कारें साफ करते हुए और भिक्षावृत्ति में शामिल देखते हैं तो केवल मूल कर्तव्यों में शिक्षा के अवसर की प्रेरणाओं को शामिल करना पर्याप्त नहीं लगता। इन सब कर्तव्यों के पालन करने के लिए हमारी सरकारों को पहल करके विशेष सामाजिक क्रांति प्रारम्भ करनी चाहिए।
सभी नागरिक मिलकर एक सरकार के माध्यम से अपने राष्ट्र का निर्माण करते हैं। इसलिए जब कुछ सिद्धान्तों को नागरिकों के मूल कर्तव्यों के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है तो स्वाभाविक रूप से वे सभी सिद्धान्त सरकार के भी मूल कर्तव्य माने जाने चाहिए। किसी सिद्धान्त को मूल कर्तव्य कहने का सीधा अभिप्राय यह है कि वह सिद्धान्त हमारे जीवन का अत्यन्त आवश्यक अंग है। मूल कर्तव्यों का महत्त्व जितना देश के नागरिकों के लिए है उतना ही महत्त्व देश की सरकारों के लिए भी समझा जाना चाहिए। नागरिक केवल सरकार के माध्यम से ही एक संगठित शक्ति बनते हैं। इसलिए हमारी सरकारों को सबसे पहले इन मूल कर्तव्यों के प्रचार-प्रसार अर्थात् इन्हें नागरिकों के दिल और दिमाग तक स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। जब सरकारें इस कार्य को प्रारम्भ कर देंगी तो स्वाभाविक रूप से अनेकों धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और अन्य गैरसरकारी संगठन भी इस प्रयास में शामिल होने लगेंगे और एक दिन ऐसा आयेगा जब स्वाभाविक रूप से देश का एक-एक नागरिक इन मूल कर्तव्यों को अपने जीवन के लक्षण के रूप में धारण करता हुआ दिखाई देगा और यही मूल कर्तव्य सरकार के प्रयासों से एक महाक्रांति के रूप में दिखाई देने लगेंगे। कर्तव्यों की यह महाक्रांति प्रारम्भ हो सकती है राष्ट्रीय कर्तव्य दिवस की घोषणा के साथ। मैं सरकार को पहले ही यह सुझाव दे चुका हूँ कि 23 सितम्बर को ‘राष्ट्रीय कर्तव्य दिवस’ के रूप में घोषित किया जाये। इस दिन भाई घन्हैया जी की जन्मतिथि है जिन्हें कर्तव्य पालन में सर्वोत्तम माना जाता है।

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