लेडी जिन्ना बनने की राह पर ममता बनर्जी?

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वोटबैंक की राजनीति के तहत कब अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की सारी हदें लांघ जाती हैं संभवतः उन्हें भी पता नहीं होता। उनके दर्जनों फैसले इस बात पर मुहर लगाते हैं। अल्पसंख्यकों के प्रति एकतरफा झुकाव एक तरह से ममता बनर्जी की नई राजनीतिक पहचान बनती जा रही है। कभी अपने तीखे तेवरों की वजह से अग्निकन्या कही जाने वाली ममता बनर्जी आज हिंदू विरोध की प्रतीक बन गई हैं। लोग यहां तक कहने लगे हैं कि अग्निकन्या लेडी जिन्ना बनने की ओर अग्रसर हैं।सवाल है कि क्या खुद को सेक्यूलर साबित करने के लिए हिंदुओं की भावनाओं को आहत करना जरूरी है। अगर नहीं, तो फिर क्यों अल्पसंख्यक वोटों को तुष्ट करने के लिए वे लगातार हिंदुओं की भावनाओं पर कुठाराघात कर रही हैं। मुस्लिम नाराज न हो जायें इसके लिए अगर दुर्गा पूजा या सरस्वती पूजा जैसे परंपरागत धार्मिक आयोजनों पर भी प्रतिबंध लगाना पड़े तो भी वे नहीं चूकतीं। उनके इस तरह के एकतरफा निर्णय को देखकर लगता ही नहीं कि उन्हें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का जरा सा भी ख्याल है। आलम यह है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने की यह प्रवृत्ति खतरे के निशान को पार कर रही है। परिणाम, पश्चिम बंगाल से आये दिन छोटी छोटी बातों को लेकर हिंदू मुस्लिम दंगे की खबरें आ रही हैं। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को लेकर कई बार उन्हें कोर्ट से भी फटकार मिल चुकी है। बावजूद इसके वे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। अभी हाल ही में उन्होंने विजयादशमी व मुहर्रम एक ही दिन होने का हवाला देते हुए मूर्तियों के विसर्जन की समय सीमा शाम 6 बजे तक कर दी। मुहर्रम के जुलूस में किसी प्रकार की कोई बाधा न आये इसके लिए उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि दुर्गा पूजा के बाद होने वाले मूर्ति विसर्जन पर 30 सितंबर की शाम 6 बजे से लेकर 1 अक्टूबर तक रोक रहेगी।
मुख्यमंत्री ने दलील दी कि चूंकि इस वर्ष दुर्गा पूजा और मुहर्रम एक ही दिन पड़ रहा है। इसलिए मुहर्रम के 24 घंटों को छोड़कर 2, 3 और 4 अक्टूबर को मूर्ति विसर्जन किया जा सकता है। मूर्ति विसर्जन की समय सीमा तय करने के ममता के इस फरमान ने लोगों को उद्वेलित कर दिया। ममता के इस नादिरशाही फैसले के खिलाफ कई संगठन मामले को कोर्ट में ले गए। अब कोर्ट की फटकार के बाद ममता सरकार ने अपने रुख में बदलाव लाते हुए विसर्जन के समय को बढ़ाते हुए रात 10 बजे तक कर दिया है। हालांकि याचिकाकर्ता इस समय को देर रात 1 बजे तक कराना चाहते थे।
पिछले साल भी ममता ने इसी तरह से मूर्ति विसर्जन पर प्रतिबंध जारी किया था, क्योंकि तब भी विजय दशमी मुहर्रम से एक दिन पहले मनाया गया था। इस फैसले के खिलाफ कोलकाता हाइकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि यह एक समुदाय को रिझाने जैसा प्रयास है। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि इससे पहले कभी विजयदशमी के मौके पर मूर्ति विसर्जन पर रोक नहीं लगी थी। हाई कोर्ट ने सरकार के निर्णय को श्मनमानाश् करार दिया था और श्जनता के अल्पसंख्यक वर्ग को खुश करनेश् का राज्य द्वारा श्स्पष्ट प्रयासश् कहा था।
बहरहाल, धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा लबादा ओढ़ने को आतुर ममता बनर्जी की ओर से मुस्लिम तुष्टिकरण की यह कोई पहली कोशिश नहीं है। इसके पहले भी रामनवमी पर निकलने वाले जुलूसों को रोकने की असफल कोशिश के साथ वे मालदा में वर्षों से चली आ रही दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध लगा चुकी हैं। इसी तरह अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम को रोकने के लिए महीनों पूर्व की गई हॉल की बुकिंग को निरस्त कर दिया गया। अपनी सियासी गोटी फिट करने के लिए ममता बनर्जी की ओर से की जा रही ये उलजुलूल हरकतें राज्य में अपना पांव जमाने की कोशिश कर रही भाजपा को खाद पानी मुहैया करा रहा है। बावजूद इसके कि वह भाजपा को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती। कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ममता की गलतियां ही भाजपा को राज्य में पनपने का अवसर प्रदान कर रही हैं।

– बद्रीनाथ वर्मा

 

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