सरकार ने आईएमए से हड़ताल वापस लेने की अपील की

नई दिल्ली। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) विधेयक 2017 पर अपनी दस में से चार मांगें मान लेने के कैबिनेट के फैसले का स्वागत किया है। आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवि वानखेडकर ने 2 अप्रैल को बाकी बचे एजेंडों पर बात करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का न्योता स्वीकार कर लिया है। आगे की रणनीति पर निर्णय लेने के लिए 2 अप्रैल 2018 को आईएमए मुख्यालय, नई दिल्ली में एक्शन ग्रुप की आपात बैठक बुलाई गई है। ‘चूंकि आईएमए द्वारा हड़ताल का आह्वान किया गया है और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर कुछ सांसदों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर असहमति जताई है, इसलिए सरकार ने इस विधेयक को आगामी चर्चा और सिफारिशों के लिए स्वास्थ्य मामलों की संसदीय स्थायी समिति में भेजने का फैसला किया है।’ इस कार्यवाही के मद्देनजर आईएमए से 2 अप्रैल 2018 की हड़ताल वापस लेने की अपील की गई है। आईएमए ने इस विधेयक की खामियों पर स्वास्थ्य मामलों की संसदीय स्थायी समिति के सदस्यों के साथ व्यापक मंत्रणा की है ताकि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा उठाई गई मांगों पर पर्याप्त सहमति बनाते हुए वे अपनी सिफारिशें भेज सकें।
एनएमसी विधेयक 2017 का पुरजोर विरोध करते हुए एकजुट होकर आवाज बुलंद करने के लिए आईएमए मीडिया और समाज के अलावा समस्त चिकित्सा क्षेत्र के लोगों का आभार व्यक्त करता है। आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवि वानखेडकर ने कहाए श्अलग से एक्जिट परीक्षा का नियम खत्म करने और एमबीबीएस फाइनल ईयर की संयुक्त परीक्षा कराने के केंद्रीय कैबिनेट का फैसला समस्त मेडिकल छात्रों के लिए लाभकारी होगा। संशोधन के जरिये आयुष डॉक्टरों के लिए ब्रिज कोर्स का प्रावधान खत्म करने और झोलाछाप डॉक्टरों तथा अयोग्य व्यक्तियों द्वारा आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने पर नए दंडात्मक नियम लागू होने का भी स्वागत है। आईएमए समस्त चिकित्सा समुदायए रेजिडेंट डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों की सफलता के लिए समर्पित है।’
नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक में संशोधन करने का केंद्रीय कैबिनेट का फैसला संपूर्ण रूप से इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के नेतृत्व में समस्त चिकित्सा जगत के असाधारण अथक प्रयासों और एकजुटता का परिणाम है। उन्होंने कहा, ‘डॉक्टरों की महापंचायत ने कैबिनेट को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मामलों की संसदीय समिति की सिफारिशें मानने और इसमें सुधार करते हुए संशोधित नया एनएमसी विधेयक लाने के लिए बाध्य किया है। सरकार से बातचीत के जरिये बाकी बची मांगें मनवाने, राजनीतिक लामबंदी मजबूत करने तथा अपने संघर्ष को जारी रखने के लिए संशोधित एनएमसी विधेयक का विस्तृत अध्ययन करने के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी। हम चिकित्सा जगत और समाज के कल्याण के लिए अपनी अधिकतम मांगे मनवाने की खातिर हर कदम पर अपना दबाव बनाए रखेंगे।’
हालांकि कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए एनएमसी विधेयक के मसौदे में राज्य प्रतिनिधित्व मामूली रूप से बढ़ाया गया है और 50 फीसदी से अधिक के शुल्क पर सरकार का नियंत्रण किया गया है, लेकिन आईएमए का अभी भी मानना है कि ये सभी प्रावधान कृत्रिम हैं और विधेयक अभी भी गरीब विरोधी, संघीय ढांचे के प्रतिकूल, प्रतिनिधित्व विहीन और अलोकतांत्रिक है। राज्य मेडिकल काउंसिल की स्वायत्तता का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। एसोसिएशन अभी भी कई बड़े मुद्दों को नहीं सुलझाए जाने को लेकर चिंतित है। मसलन, चयनित सदस्यों की सांकेतिक उपस्थिति, राज्य सरकारों और मेडिकल विश्वविद्यालयों का अनुपयुक्त प्रतिनिधित्व तथा एनएमसी की स्वायत्तता का अभाव के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है।
डॉ. रवि ने कहा, ‘संवैधानिक और वैधानिक दायरे से बाहर रहते हुए एक सवाल अब भी बना हुआ है कि एनएमसी का सदस्य नहीं होने वाला कोई सेवानिवृत्त जज कैसे ईएमआरबी का चेयरमैन नियुक्त किया जा सकता है, आईएमए ने एमसीआई अधिनियम की धारा 15 (2) (बी)  को बरकरार रखने की भी मांग की है जो स्टेट मेडिकल प्रैक्टिसनरों के हित की बात करती है। आईएमए ने एक स्वास्थ्य नीति लाने तथा आईएमए नीति को स्वीकार करने वाले अभ्यर्थियों को समर्थन देने का भी फैसला किया है। यह नीति त्रिचुर में आईएमए की कर्नाटक प्रदेश शाखा की प्रदेश कार्यकारिणी समिति की 8 अप्रैल 2018 को होने वाली बैठक में पेश की जाएगी।’

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