अर्थव्यवस्था पर कोरोना का ग्रहण

-नीलम सूद
वुहान चीन का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक केंद्र है, इसलिए यहां अनेक देशों के उद्योगपतियों का आना-जाना लगा रहता है। कई देशों के कर्मचारी यहां कार्यरत हैं। कोरोना वायरस की उत्पत्ति भी इसी शहर से हुई और देखते ही देखते इसने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया। 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की नींव पड़ी, अनेक देशों ने एक-दूसरे से व्यापारिक संबंध बनाने की संधि पर हस्ताक्षर किए और फिर शुरुआत हुई एक प्रतिस्पर्धा की। भारत भी अपने परंपरागत व्यवसाय से विमुख हो इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ और आरंभ हुआ एक नए औद्योगिक युग का। तकनीक के नए-नए आयामों ने औद्योगिकरण को पंख लगाए जिससे आरामपरस्त एवं ऐश्वर्ययुक्त जीवन जीने की शैली का आरंभ हुआ। समूचा विश्व भौतिकता की चपेट में आ गया। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होने से पृथ्वी पर बोझ बढ़ा और पर्यावरण प्रदूषित होता चला गया। विश्व के अनेक पर्यावरण प्रेमियों एवं संगठनों ने समय-समय पर आने वाले संकट से सरकारों को सचेत किया, परंतु विश्व के सभी देशों की सरकारों ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा, रोजगार एवं सकल घरेलू उत्पाद को अहमियत देकर इस चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। आज जब पूरा विश्व एक तरफ कोरोना संकट से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ सभी उद्योग-धंधे लगभग ठप्प पड़े हैं जिससे संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है। लाखों लोग बेरोजगार हो चुके हैं। विश्व भर में एक तरफ कोरोना से जंग भारी पड़ रही है तो दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। भारत की स्थिति भी भिन्न नहीं है, बल्कि यहां तो कई ऐसे तथ्य हैं जो समाधान की राह पर किसी चट्टान की भांति अटल हैं।
देश की अर्थव्यवस्था कोरोना से पूर्व ही संकट झेल रही थी, महंगाई लगभग उच्चतम स्तर और सकल घरेलू उत्पाद निम्न स्तर को छूने के कारण वित्त मंत्रालय के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। भ्रष्टाचार के कारण लोन वितरण में हुई धांधलियों से कई निजी क्षेत्र के बैंक या डूब चुके थे या डूबने के कगार पर थे। सरकारी क्षेत्र के बैंकों की दशा भी अधिक संतोषजनक नहीं थी। वित्त मंत्रालय का बार-बार पत्रकार सम्मेलन कर लोगों को आश्वस्त करना कई सवालों को जन्म देता था। जीडीपी अर्थात सकल घरेलू उत्पाद को प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू आय से आंका जाता है। औद्योगिकरण से प्रति व्यक्ति आय में अपार असमानता आ जाती है जिससे प्रति व्यक्ति आय को एवरेज के हिसाब से निकालना सही नहीं ठहराया जा सकता। एक तरफ गरीब किसान हैं तो दूसरी तरफ कारपोरेट जगत। राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण भू-अधिग्रहण एवं किसानों को मिलने वाले कर्ज व मुआवजे में अनियमितताओं ने किसानों की दशा अति दयनीय बना दी है। यहां तक कि वे आत्महत्या तक करने पर मजबूर हैं।
पंचायती राज में भ्रष्टाचार एवं अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे अयोग्य व्यक्तियों के हाथों पंचायतों का दारोमदार होना भी देश की दुर्दशा का एक कारण है। केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई अनेक योजनाओं को ये पंचायत प्रतिनिधि अपने लोगों तक पहुंचाने में असमर्थ होते हैं जिससे गांव वालों के हालात सुधरने की अपेक्षा बिगड़ते जाते हैं और वे गांव से शहर की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। पंचायत प्रतिनिधि केवल विधायक और सांसद के इशारे पर उनके वोट बैंक के लिए किसी एजेंट की तरह कार्य करते हैं। बढ़ती जनसंख्या गरीबी, बेरोजगारी एवं भुखमरी का सबसे बड़ा कारण है। भारत में बढ़ती जनसंख्या अनेक समस्याओं की जड़ है। अज्ञानता, अनपढ़ता, अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरवाद ने स्थिति को और भी भयावह बना दिया है। भारतीय संविधान के दोहरे मापदंड जनसंख्या नियंत्रण के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ और हिंदू लॉ की अलग-अलग धाराओं से स्थिति बेकाबू हो चुकी है। विगत वर्षों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकारों द्वारा इसलिए सख्त कानून नहीं बनाए गए क्योंकि औद्योगिकरण से जीडीपी बढ़ाने के लिए जनसंख्या वृद्धि एक सार्थक जरिया होता है अर्थात जनसंख्या के हिसाब से उत्पादन बढ़ता, उपभोग बढ़ता है, कम और सस्ती दरों पर मजदूर मिलते हैं और घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक क्षेत्र को एक विस्तृत बाजार मिलने की अपार संभावनाएं बनी रहती हैं। परंतु कोरोना के कारण स्थिति विपरीत हो चुकी है, अब बढ़ती जनसंख्या देश को बेरोजगारी एवं भुखमरी के कगार तक पहुंचा सकती है। कुल मिलाकर कहें तो संपूर्ण विश्व को कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी पड़ेगी एवं गहनता से विचार करना पड़ेगा ताकि पर्यावरण की रक्षा भी हो और मानव जाति का कल्याण भी हो।

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