मुख्य एजेंडे से दूर हो गया परिवार कल्याण

विश्व जनसँख्या दिवस (11 जुलाई)

-डॉ. प्रभात कुमार सिंघल,
लेखक एवं पत्रकार (कोटा)

बढ़ती जनसंख्या घटते संसाधन के सर्व विदित तथ्य पर बहस कर, जनसँख्या वृद्धि के कारणों, प्रभावों, परिणामों पर चर्चा करना, जनसँख्या बढ़ोतरी के सामने विकास को बोना बताने और आजादी के बाद के बढ़ती जनसंख्या के आंकड़ों के माया जाल में उलझने की अपेक्षा इस बार गम्भीरता से सोचे कि जनसँख्या को निरन्तर बढ़ने से नियंत्रित करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं? इन प्रश्नों के मूल में जाने से ही कोई राह निकल सकती है।
आज प्रतीत होता है कि परिवार कल्याण केंद्र और राज्य सरकारों के मुख्य एजेंडे से गधे के सींग की तरह गायब हो गया है। कहीं कोई चर्चा नहीं होती। प्रधान मंत्री हो, मुख्य मंत्री हो, केंद्रीय या राज्य मंत्रीगण हो उनके उद्बोधनों में आज परिवार कल्याण की चर्चा तक सुनाई नहीं देती। परिवार कल्याण की जगह स्वछता अभियान ने ले ली हैं। पूरा साल गुजर जाता है परिवार कल्याण के कार्यक्रमों एवं उपायों पर चर्चा किये बिना। क्या केवल विश्व जनसँख्या दिवस को कुछ कार्यकर्मो के साथ आयोजित करना, इस दिन को सप्ताह या पखवाड़ा मनाने से इतिश्री कर लेना पर्याप्त होगा। मुझे स्मरण हो आता है पूर्व उपराष्ट्रपति स्व.भैरोंसिंह शेखावत जी का जिनकी अंतिम समय तक भी बढ़ती जनसंख्या को कम करने की चिंता बनी रही। कहीं भी कैसा भी अवसर हो उनका भाषण परिवार को सीमित रखने के सन्देश के बिना पूरा नहीं होता था। वे सभी को कहते थे कि जब कहीं भी भाषण करो परिवार कल्याण की चर्चा जरूर करो। बढ़ती जनसँख्या हमारी सबसे बड़ी समस्या है। वे इस दिशा में सदैव चिंचित रहें।
जनसँख्या वृद्धि इतनी गम्भीर समस्या है कि विकास कमतर नजर आता हैं, अर्थव्यवस्था को प्रभावित होती है, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना पड़ रहा हैं, वायु एवं जल प्रदूषण की भयावह स्थिति बनती हैं, कभी बाढ़ तो कभी सूखे झेलना पड़ता हैं, गांवों में रोजगार की कमी से शहरों की ओर पलायन, शहरों में जुग्गी-झोपड़ का विकास, बेतहाशा दिनों दिन बढ़ती बेरोजगारी इस बात को शिद्दत से रेखाँकित करती है कि सब को मिलकर जनसँख्या वृद्धि के भगीरथ और यक्ष प्रश्न को सर्वाधिक महत्व उसी प्रकार देना होगा जो महत्व आज स्वछता अभियान को मिल रहा है।
आज की यह ज्वलंत समस्या संकेत देती है कि आज भी परिवार कल्याण कार्यक्रम दूर दराज क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाया हैं और विभिन्न समुदायों को इसका महत्व समझने में और उन्हें जागरूक करने में कारगर नहीं हो पाया हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को इसे सर्वोच्च प्राथमिता दे कर मुख्य एजेंडा बनाना होगा और दूरस्थ अंचलों तक प्रभावशाली जन आंदोलन चलना होगा।
सरकार से ही हम सारी उम्मीद करें और स्वयं कुछ नहीं करें इस से काम चलने वाला नहीं। ऐसा भी नहीं है कि लोगों ने परिवार कल्याण अर्थात सीमित परिवार के महत्व को नहीं समझा है या यह कार्यक्रम पूर्ण रूप से निष्फल हो गया हैं। वह समय कालकलवित हो गया जब एक परिवार में आमतौर पर सात-आठ संतानें हुआ करती थी। न बच्चे पढ़ पाते थे, न उचित पोषण होता था और परिवार का मुखिया अकेला अनेक संकटों से जूझता रहता था। धीरे-धीरे जब इस कार्यक्रम का महत्व समझ में आने लगा तो परिवार की खुशियां 2 से 3 बच्चों तक सिमट ने लगें और आज यह खुशियां 2 और एक बच्चे तक भी सिमट गई हैं।
पुरुष प्रधान समाज में लड़के की चाह में कई बार ज्यादा संतानें हो जाती हैं। समाज तो अब भी पुरुष प्रधान ही हैं परंतु अब जब कि लड़कियां भी आगे आकर हर क्षेत्र में लड़कों से मुकाबला कर रही हैं और कई अर्थों में उनसे आगे निकल रही हैं ऐसे में समाज के सोच में बदलाव स्पस्ट दिखाई देता हैं। अब दो बच्चों के परिवार और लड़की के महत्व को समझने वाले परिवारों में दो लड़कियां होने पर भी वे सन्तति नियंत्रण उपाय अपनाने लगे हैं। अक्सर यह कहते सुना जाता है कि लड़का ही क्या निहाल करेगा लड़की कम से कम पूछेगी तो सही। यह देखने को भी मिलता है कि आज जब वृद्धावस्था में सहारे की जरूरत होती है ऐसे में लड़के की बेरुखी। और बेगानापन भुगतना पड़ता हैं। वृद्ध सन्तान को बोझ लगने लगी हैं। वृद्धजनों के प्रति लड़कों के उपेक्षित भाव ने परिवारों में लड़के होने की प्रबल भावना पर कहीं आघात किया है, विचारों में बदलाव आया हैं और केवल लड़के की चाह में ज्यादा बच्चे करने की प्रवृति में भी कमी आने लगी है। आज अनेक परिवारों में एक सन्तान पर ही खुशी के प्रसंग भी देखने को मिलने लगे हैं। उनका मानना होता है कि इतनी महंगाई के समय में जब कि शिक्षा-स्वास्थ्य पर ही बड़ी राशि खर्च करनी होती हैं, एक बच्चे को ही अच्छी तरह पाल-पोश ले, अच्छा पढा ले और अपने पैरों पर खड़ा कर दें वही बहुत है।
जो लोग छोटे परिवार के महत्व को समझ गए हैं उन्होंने परिवार कल्याण कार्यक्रम को अपनाया हैं। ऐसे लोगों को अन्यों को प्रेरित करने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। समाज में रोल मॉडल बन कर आगे आकर जागरूकता में योगदान देना होगा। हर व्यक्ति ठान ले कि वह कम से कम पांच व्यक्तियों को जागरूक करेगा और उन्हें सीमित परिवार बनाने के लिए संकल्पबद्ध करेगा तो जनसँख्या नियंत्रण में अपना महत्ती योगदान कर सकता हैं। इसके लिए उन्हें ढूंढने की जरूरत नहीं वरन अपने सम्पर्क वाले व्यक्तियों को ही लिया जा सकता है। जनसँख्या पर दुष्प्रभाव प्रभाव डालने वाले कारकों प्रदूषण, अवैध खनन, नदियों को प्रदूषित होने से बचाने, गांवों में रोजगार के विकल्प तलाशने आदि की ओर भी नागरिकों को आगे आना होगा। साक्षरता और पौधरोपण अभियानों में दमदार भागीदारी निभानी होगी।
यह बदलाव और जागरूकता स्वागत योग्य है परंतु अभी बहुत कुछ किया जाना हैं। आज भी दूरस्त क्षेत्रों में, मजदूरों में, आदिवासियों में, जनजातियों में, अल्पसंख्यक जैसे समुदायों में परिवार कल्याण का प्रचार, अंतराल साधनों की उपलब्धता, गर्भवती की देखभाल, जच्चा-बच्चे की देखभाल, टीकाकरण के प्रति जागरूकता के और अधिक प्रयासों की आवश्यकता हैं। सरकार के साथ-साथ आम जागरूक नागरिक एवं गैर सरकारी समाज सेवी संगठनों को भी आगे आ कर सक्रिय भागीदारी करनी होगी। सभी के सम्मिलित प्रयासों से ही जनसँख्या नियंत्रण की दिशा में कुछ बेहतर होने की आशा की जा सकती है।
आपको बता दें कहने को हम 1951 की जनगणना में 23.83 करोड़ से बढ़ कर 2011 की सात दशकीय जनगणना में 1.22 अरब हो गए और 2019 तक 1.30 अरब होने की बात कही जा रही हैं। गौरतलब है कि देश की जनसंख्या वृद्धि दर में विगत दो दशकीय जनगणना में कमी दर्ज की गई है जो हमारे लिए संतोष का विषय है।

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