जनसंख्या विस्फोट को रोकना ही होगा

-विमल वधावन योगाचार्य
एडवोकेट (सुप्रीम कोर्ट)

गत वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने लालकिले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट कहा था कि जनसंख्या विस्फोट हमारी भावी पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी इस सम्बन्ध में गम्भीरता पूर्वक योजनाएँ लागू करनी चाहिए। प्रधानमंत्री जी ने जनता को प्रोत्साहित करने के लिए यहाँ तक कह दिया कि कम बच्चे पैदा करना ही राष्ट्रभक्ति का कार्य माना जायेगा। छोटा परिवार ही वास्तव में सुखी परिवार हो सकता है, क्योंकि छोटा परिवार रोगों से दूर रहेगा और अधिक संसाधनों का आनन्द लेगा। प्रधानमंत्री जी के इस सम्बोधन को सुनकर यह स्पष्ट संकेत मिला कि केन्द्र सरकार जनसंख्या नियंत्रण की नीति पर गम्भीर है और हो सकता है निकट भविष्य में केन्द्र सरकार अर्थात् भारत की संसद जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक प्रभावशाली और राष्ट्रव्यापी कानून बनाकर लागू करे।
कोरोना महामारी के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह सम्भावना जताई है कि वर्तमान वर्ष 2020 के अन्त तक भारत की जनसंख्या बहुत तेज गति से बढ़ सकती है। इस समय हम सारे विश्व को एक ऐसी महामारी से संघर्ष करते हुए देख रहे हैं जिसमें अमेरिका जैसे बड़े-बड़े देशों के पास भी चिकित्सा साधनों की कमी का प्रश्न खड़ा हो गया है। मेरे विचार में किसी भी देश की बहुतायत समस्याओं का समाधान जनसंख्या नियंत्रण से सरलता पूर्वक ढूंढ़ा जा सकता है। देश में यदि मुकदमेंबाजी बढ़ती जा रही है तो उसके पीछे भी जनसंख्या वृद्धि एक प्रमुख कारण दिखाई देता है।
देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो उसका भी मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि है। बेरोजगारों की बढ़ती हुई संख्या तो सीधे-सीधे जनसंख्या वृद्धि से जुड़ी ही है। प्रदूषण की समस्या भी सीधे रूप में बहुत बड़ी जनसंख्या से ही सम्बन्धित है। अमीर-गरीब के लिए शिक्षा में भेदभाव भी जनसंख्या वृद्धि का ही परिणाम है। किसी भी समाज में अपराधों का बढ़ना भी जनसंख्या वृद्धि से जुड़ा है। इसी कारण जेलों का कुप्रबन्धन भी एक ऐसा रोग बन चुका है जिसका कोई इलाज दिखाई नहीं देता। देश में खाद्य पदार्थों की कमी और परिणामस्वरूप कमरतोड़ मंहगाई भी जनसंख्या वृद्धि का ही परिणाम है। जंगल और हरियाली कम होती जा रही है इसका भी सीधा सम्बन्ध जनसंख्या वृद्धि के साथ है। गरीब लोगों के सामने हर समय रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ भी एक भारी समस्या बनी रहती है, इसके पीछे भी जनसंख्या वृद्धि ही प्रमुख कारण है। खाद्य पदार्थों में मिलावट और रासायनिक दूध का निर्माण भी जनसंख्या वृद्धि का परिणाम है। खेती में यूरिया जैसे रसायनों का प्रयोग भी इसीलिए किया जाता है जिससे किसी भी तरह अधिक अन्न उपजाकर बढ़ती हुई जनसंख्या को दो वक्त की रोटी मिल सके। रसायनों के प्रयोग के कारण धरती माता की शक्तियाँ भी कमजोर होती जा रही हैं, यह भी जनसंख्या वृद्धि के कारण है। सड़कों पर, बसों में, रेलों में और यहाँ तक कि हवाई जहाजों में बढ़ती भीड़ भी जनसंख्या वृद्धि का परिणाम है। देश की लगभग सभी समस्याओं का यदि संयुक्त रूप से अनवेक्षण किया जाये तो पता लगेगा कि देश में बढ़ते शारीरिक रोग, मानसिक रोग और यहाँ तक कि आत्महत्या की प्रवृत्तियों के बढ़ने के पीछे भी जनसंख्या वृद्धि ही कारण दिखाई देगा। जब यह निश्चित है कि हमारे देश की बहुतायत समस्याओं का कारण जनसंख्या वृद्धि है तो क्यों न समय रहते इस जनसंख्या वृद्धि की समस्या को जड़ से काबू करने का प्रयास किया जाये।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आने वाले आठ वर्षों में अर्थात् वर्ष 2028 तक भारत की जनसंख्या चीन से भी आगे निकल जायेगी और भारत विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जायेगा। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि अगले आठ वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था की प्रगति को रोकने के लिए यही एक कारण बहुत बड़ा सिद्ध होगा। कोरोना महामारी ने वैसे ही भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ी ठेस पहुँचाई है। इसलिए अब भारत सरकार के पास जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक प्रभावशाली कानून बनाने के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है। भारत में यदि ढाई करोड़ बच्चे प्रतिवर्ष पैदा होते हैं तो अर्थव्यवस्था के लिए इससे बड़ी कोई चुनौती नहीं होगी कि हम प्रतिवर्ष इतनी बड़ी संख्या में नौकरियों और रोजगार का निर्माण कैसे करेंगे। इससे पहले कि भारतीय जनसंख्या का विस्फोट बहुत बड़े स्तर तक पहुँचे भारत की सरकारों को गम्भीरता पूर्वक इस विषय पर तत्काल कानून बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
जनसंख्या नियंत्रण के लिए पिछले कई दशकों से केन्द्र और राज्य सरकारों के छुटपुट प्रयास चलते रहे हैं जैसे घर-घर गर्भ निरोधक औषधियों और निरोध आदि पहुँचाना, अधिक बच्चे न पैदा करने की सलाह, दो बच्चों के बीच अधिक समय अन्तराल रखने की सलाह। परन्तु यह सब उपाय दण्डात्मक प्रावधानों के अभाव में अधिक लाभकारी सिद्ध नहीं हुए। विगत कुछ समय से नीति आयोग जनसंख्या नियंत्रण को अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सबसे अच्छा उपाय घोषित करता रहा है। परन्तु ऐसा लगता है कि अभी सरकार की इच्छा शक्ति पर्याप्त क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रही है।
कुछ समय पूर्व भारतीय संसद में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कुछ प्राइवेट मेम्बर बिल भी प्रस्तुत किये गये। शिवसेना के सांसद श्री अनिल देसाई के द्वारा फरवरी, 2020 में प्रस्तुत बिल में यह प्रावधान था कि छोटे परिवार का पालन न करने वाले लोगों को कोई सरकारी सहायता नहीं मिलनी चाहिए। दूसरी तरफ छोटे परिवार वाले लोगों को आयकर, सामाजिक सहायता योजनाओं, रोजगार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए। जो लोग छोटे परिवार नियम का पालन नहीं करें उन्हें किसी प्रकार के टैक्स की छूट न मिले और उन पर अधिक कर लगाये जायें। इससे पूर्व वर्ष 2016 में भाजपा सांसद श्री प्रहलाद सिंह पटेल ने भी लगभग ऐसा ही एक बिल संसद में प्रस्तुत किया था। जुलाई, 2019 में एक अन्य भाजपा सांसद श्री राकेश सिन्हा ने तो अपने बिल में यहाँ तक सुझाव दिया था कि दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों को कई प्रकार से दण्डित किया जा सकता है जैसे उनके किसी भी निर्वाचन में भाग लेने पर प्रतिबन्ध और बैंक से ऋण लेने पर अधिक ब्याज। जबकि दो बच्चों तक सीमित परिवार को आयकर छूट, निःशुल्क चिकित्सा सुविधाएँ, घर या जमीन के लिए ऋण, शिक्षा सुविधाएँ आदि शामिल हैं। परन्तु प्राइवेट बिलों का कभी कोई परिणाम नहीं निकलता। इसलिए यह पहल सरकार को ही करनी होगी कि हर प्रकार से सोच-विचार कर छोटे परिवार वालों को सुविधाओं का पिटारा और बड़े परिवार वालों की सुविधाओं आदि पर प्रतिबन्ध इस हद तक लगाये जा सकते हैं जिससे उनका प्रभाव केवल माता-पिता तक सीमित रहे, पैदा होने वाले बच्चों पर उसका प्रभाव न पड़े क्योंकि एक परिवार में यदि तीसरा बच्चा पैदा होता है तो इसमें उस व्यक्तिगत आत्मा का कोई दोष नहीं होता। इसलिए प्रतिबन्धों आदि का प्रभाव केवल माता-पिता तक ही सीमित रहे। इस केन्द्रीय सिद्धान्त को ध्यान में रखकर ही सकारात्मक और नकारात्मक प्रावधानों का संकलन करना पड़ेगा।

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