नशे के लचीले कानून में संशोधन आवश्यक

-विमल वधावन योगाचार्य, एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट
संसद या विधानसभाओं के द्वारा जब कानून बनाये जाते हैं तो उन कानूनों का उल्लंघन करने वाले लोगों के दिमाग इस उधेड़-बुन में लग जाते हैं कि हम कानूनी प्रावधानों की गलतियों या लचीलेपन का लाभ किस प्रकार उठा सकते हैं। भारत में नशे की रोकथाम के लिए नारकोटिक ड्रग्स एवं साइकोट्राॅपिक सब्सटेन्स कानून 1985 से लागू है। इसे संक्षिप्त में नारकोटिक कानून कहा जाता है। संसद द्वारा बनाये गये इस कानून का मुख्य उद्देश्य नशीले पदार्थों के प्रचलन पर नियंत्रण करना है। इस कानून से पहले केन्द्र तथा राज्य स्तरों पर नशे की रोकथाम के लिए भिन्न-भिन्न कानून लागू थे। परन्तु उसके बावजूद राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नशे के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए केन्द्रीय संसद ने यह महसूस किया कि उस समय के कानूनों में कई कमियाँ और लचीले प्रावधान थे। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नशे की रोकथाम के लिए सभी देशों पर दबाव बढ़ता जा रहा था। इन परिस्थितियों में भारत की संसद ने एक पूर्ण कानून बनाने की पहल की जिसमें नशे के व्यापार पर जुर्माने की राशियाँ भी बढ़ा दी गई। भारत में नशे का व्यापार लगातार बढ़ता ही जा रहा था।
इस कानून के नियम-65ए में यह स्पष्ट किया गया कि कोई भी व्यक्ति किसी नशीले पदार्थ को खरीद, बेच या प्रयोग नहीं कर सकता, जब तक ऐसा करना औषधि कानून के अन्तर्गत उसके लिए अनिवार्य न हो। नियम-66 यह स्पष्ट करता है कि औषधि कानून के अन्तर्गत अनिवार्य होने पर भी कोई व्यक्ति ऐसे पदार्थों को तब तक अपने पास नहीं रखेगा जब तक उसके पास निश्चित उद्देश्यों के लिए ऐसे नशीले पदार्थ को रखने का कानूनी अधिकार हो। नियम-66 के उपनियम-2 में यह कहा गया है कि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत चिकित्सा प्रयोग के लिए किसी नशीले पदार्थ को रख सकता है परन्तु उसकी मात्रा 100 खुराक से अधिक नहीं होनी चाहिए। इतना ही नहीं इसी उपनियम में आगे यह भी कहा गया है कि कोई व्यक्ति एक समय पर 100 खुराक से अधिक मात्रा में भी ऐसे नशीले पदार्थों को रख सकता है, परन्तु यह मात्रा 300 खुराक से अधिक नहीं होनी चाहिए और वह भी उस अवस्था में जब उसकी व्यक्तिगत चिकित्सा लम्बे समय तक चलनी हो और इस आशय का प्रमाण पत्र एक पंजीकृत चिकित्सक द्वारा दिया गया हो। इसी उपनियम में अस्पतालों, डिस्पेंसरियों या अनुसंधान संस्थाओं को ऐसे नशीले पदार्थों के खरीदने और बेचने से सम्बन्धित उचित रिकाॅर्ड रखने का निर्देश दिया गया है।
पंजाब के एक व्यक्ति पर इसी कानून के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया गया कि उसके पास से कुछ विशेष नशीले पदार्थ पाये गये। आरोपी ने पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी जमानत याचिका में यह कहा गया कि उसके पास से बरामद मात्रा नियम-66 के उपनियम-2 में व्यक्त मात्रा से कम है। अपनी जमानत के समर्थन में उसने पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के कई पूर्व निर्णयों का भी संदर्भ प्रस्तुत किया।
जमानत याचिका का विरोध करते हुए सरकार की तरफ से नारकोटिक कानून की धारा-37 के आधार पर कहा गया कि इस प्रावधान के अनुसार नारकोटिक कानून के अन्तर्गत आरोपित व्यक्ति को जमानत नहीं दी जा सकती जब तक यह विश्वास न हो कि वह पुनः ऐसा अपराध नहीं करेगा और अदालत जमानत देने के निर्णय से संतुष्ट हो। यह स्पष्ट है कि नारकोटिक कानून का प्रमुख उद्देश्य नशीले पदार्थों के प्रचलन की रोकथाम और नियंत्रण है।
पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय ने आरोपी की जमानत याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा कि नारकोटिक कानून की धारा-37 और नियम-66 का उपनियम-2 परस्पर विरोधाभासी हैं। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि यदि व्यक्तिगत चिकित्सा प्रयोग के लिए दी गई छूट का प्रयोग मान्य किया गया तो हर व्यक्ति 100 खुराक तक के नशीले पदार्थ रखने लगेगा। नशीले पदार्थों के कारण देश का युवा वर्ग पहले ही बर्बाद हो रहा है। नशे से सम्बन्धित दर्ज होने वाले आपराधिक मुकदमों की बढ़ती संख्या के बावजूद भी नशे की प्रवृत्तियों पर कोई रोकथाम नहीं लग रही है। इसका प्रमुख कारण उपनियम-2 जैसे लचीले प्रावधान ही दिखाई देते हैं। न्यायालय ने कहा कि कानून में यथोचित संशोधन करके इस उपनियम के लचीलेपन को समाप्त किया जाना चाहिए। ऐसे लचीले प्रावधान अपने आपमें ही बेतुके दिखाई देते हैं क्योंकि यह लचीलापन कानून के मुख्य उद्देश्य से किसी प्रकार मेल नहीं खाता। कानून का मुख्य उद्देश्य नशे को पूरी तरह नियंत्रण करने से सम्बन्धित है, जबकि यह प्रावधान नशे के प्रचलन को बढ़ाने में सहायक है। न्यायालय ने जमानत याचिका को अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों का भी संदर्भ प्रस्तुत किया।
न्यायालय ने नशे के बढ़ते प्रचलन को लेकर इस निर्णय में गम्भीर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि नशे के कारण तो बहुत बड़ी संख्या में युवा लोग मृत्यु के शिकार हो रहे हैं। पंजाब में नशों की हालत इतनी खराब होती जा रही है कि ऐसा लगने लगा है जैसे अब नशों का आतंकवाद इस प्रान्त में प्रारम्भ हो चुका हो। नशे के कारण समाज का ताना-बाना भी असंतुलित हो रहा है। नशे की आवाजाही पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण भी दिखाई नहीं देता। ऐसे में 100 खुराक तक नशीले पदार्थों को रखने की अनुमति देने वाला प्रावधान कानून के मुख्य उद्देश्य में सहायक नहीं बन सकता। कानून निर्माताओं को अपने बनाये गये पूरे कानून को एक दृष्टि से देखना चाहिए। कानून का प्रत्येक प्रावधान मुख्य उद्देश्य का सहायक होना चाहिए। अदालतों का भी यही कत्र्तव्य है कि कानून का निर्माण करने वाली संस्थाओं के मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही सभी प्रावधानों की व्याख्या करे। यदि कोई प्रावधान मुख्य उद्देश्य से हटा हुआ भी दिखाई दे रहा हो तो भी उसे महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए।

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