बढ़ रहा है बेटियों को गोद लेने का रूझान

– रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार
राजस्थान में झुंझुनू जिले के भानीपुरा गांव में कुछ दिन पहले एक नवजात बच्ची को कोई शिव मंदिर के बाहर चबूतरे पर छोड़ गया। सुबह मंदिर के पुजारी को यह बच्ची मिली। पुलिस की सहायता से उस बच्ची को झुंझुनू के बीडीके अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बीडीके अस्पताल के स्टाफ ने बच्ची को लक्ष्मी नाम दिया। बुहाना की सुनीता का नवजात बेटा भी अस्पताल में भर्ती था। उसे दूध पीने में तकलीफ थी। सुनीता ने बताया उसके तीन बेटे हैं, बेटी चाहती थी लेकिन चैथा भी बेटा हो गया। अस्पताल में लक्ष्मी के बारे में सुना तो उसे ही बेटी मान उसे अपना दूध पिलाया। सुनीता ने कहा कि मैं तो चाहती थी कि लक्ष्मी मुझे ही मिल जाए। सुनीता सहित सात-आठ दम्पतियों ने अस्पताल में लक्ष्मी को गोद लेने की इच्छा जताई।
मुरादाबाद से करीब 15 किलोमीटर दूर झाड़ियों में किसी बच्चे की रोने की आवाज सुनकर गांव में रहने वाली जायदा वहां पहुंची तो देखा कि एक मासूम जोर-जोर से रो रही है। जायदा ने बच्ची को उठाया और गांव की शब्बो के साथ बच्ची को लेकर पुलिस थाने पहुंची। पुलिस कार्रवाई के दौरान बच्ची शब्बो के पास रही। पुलिस वालों से शब्बो ने कहा कि बच्ची को उसको दे दें। लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। महिला का कहना था कि अगर बच्ची उसे दे दी जाती तो दोनों की जिंदगी बेहतर हो जाती।
पुलिस ने बताया कि थाने में 5 से 6 घंटों के बीच बच्ची को गोद लेने के लिए कई लोग आए। जिसमे गांव के लोगों के अलावा पुलिस का एक सिपाही भी था। उसका कहना था कि भाई को बच्चे नहीं है अगर यह बच्ची मिल जाती तो उनकी जिंदगी बेहतर हो जाती। यही नहीं जब मैं बच्ची का मेडिकल कराने अस्पताल गया तो वहां भी एक साहब ने कहा बच्ची हमें दे दो। बच्ची को बाल कल्याण समिति मुरादाबाद को सौंप दिया गया था। जहां बच्ची को गोद लेने 250 से ज्यादा लोगो ने इच्छा जतायी।
हरियाणा में बेटियों के प्रति सोच मे बदलाव आ रहा है। इसके साथ बदल रही है लोगों की सोच और बेटियों के प्रति नजरिया। वह भी ऐसे समाज के लोगों का जहां बेटों की चाह में बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। इस माहौल के बीच सोच में बदलाव की रोशनी भी दिख रही है। हरियाणा में फतेहाबाद के किरढाना में एक दम्पती ने बेटा पैदा होने पर उसे अन्य दम्पती को गोद दे दिया और उनकी बेटी को अपना लिया।
ऐसी नई सोच के प्रतिनिधि हैं हरियाणा के हिसार जिले के किरढान गांव के अनूप सिंह और उनकी पत्नी सीता। दोनों ने अपने नवजात बेटे को किसी और दम्पती को गोद दे दिया और उनकी बेटी को गोद ले लिया। इस दम्पती ने बेटी की चाह में दूसरे बच्चे को जन्म देने का फैसला लिया। लेकिन इसे बेटा ही पैदा हुआ। इसके बाद इस दम्पती ने मिसाल कायम करते हुए अपने नवजात बेटे के बदले बेटी गोद ले ली। उनका बेटा जिनकी गोद में गया है उनकी भी चाहत पूरी हो गई। दूसरा परिवार हिसार के गांव किशनगढ़ का रहने वाला है। दोनों परिवार में आपस में पहले से कोई रिश्तेदारी व जान-पहचान नहीं थी। अस्पताल में ही दोनों परिवारों का परिचय हुआ। मगर आज दोनों परिवारों के बीच गहरा रिश्ता कायम हो गया है।
उपरोक्त उदाहरण इस बात को दर्शाते हैं कि आज लोगो की सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। बेटी बचाओ और देश बचाओ वाले नारे पर लोग अब अमल करने लगे हैं जिस कारण देश में अब बेटी को गोद लेने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। भारतीय समाज में लड़कियों को लडकों के मुकाबले कम तरजीह दी जाती है। लेकिन गोद लेने के मामले में भारतीय परिवार लड़कियों को तवज्जो देते नजर आते हैं। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) में इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में अब लोग नई सोच के तहत बेटों के बजाय बेटी को गोद ले रहे है।
इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि आंकड़ें बताते हैं कि पिछले छह सालों में जितने बच्चे गोद लिए गए हैं, उनमें तकरीबन 60 फीसदी लड़कियां है। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा बच्चे महाराष्ट्र में गोद लिए गए। महाराष्ट्र में साल 2016-17 में करीब 3210 बच्चे गोद लिए गए थे। इसमें करीब 1915 लड़कियां हैं। साल 2015-16 में गोद लिए जाने वाले बच्चों का कुल आंकड़ा 3011 था। इसमें करीब 1855 लड़कियां थीं और 1156 लडके। 2014-15 में 2300 लड़कियां गोद ली गईं, लडके 1688। 2013-14 में 2293 लड़कियां और 1631 लडके गोद लिए गए।
बच्चियों को गोद लेने के मामले में महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक का स्थान आता है। कर्नाटक में कुल 286 बच्चे गोद लिए गए। इसमें 167 लड़कियां थीं। कर्नाटक के बाद तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल का नाम आता है। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के मुताबिक महाराष्ट्र बच्चियों को गोद लेने के मामले में सिर्फ इसलिए आगे नहीं है क्योंकि यह राज्य बड़ा है, बल्कि इसका एक बड़ा कारण राज्य में अधिक गोद देने वाली संस्थाओं का होना भी है। इसके पीछे लोगों का मानना है कि लड़कियों को पालन-पोषण करना केवल कत्र्तव्य ही नहीं होती बल्कि इसके पीछे श्रद्धा और संस्कार भी होते हैं। वैसे भी समाज में कम हो रही लड़कियों की संख्या की पूर्ति के लिए लोगों की ओर से उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सालों में विदेशी परिवारों ने भी भारतीय बच्चों को बड़ी संख्या में गोद लिया है। साल 2017-18 में करीब 651 बच्चों को विदेशी परिवारों ने गोद लिया था। अधिकतर परिवार अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन आदि देशों से थे। अब समाज में लड़कियों को लेकर नजरिया बदल रहा है। लोगों को लगने लगा है कि बच्चियों को संभालना ज्यादा आसान है। इन आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों के भी परिवार लड़कियों को गोद लेना अधिक पसंद करते हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पुरुषों और महिलाओं के सेक्स अनुपात में एक बड़ी खाई है।
बदलते जमाने के साथ लोगों की सोच में भी बड़ा बदलाव आ रहा है। अब लोग बेटों से ज्यादा बेटियों की चाहत रखने लगे हैं। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्सेज एजेंसी (कारा) में करीब 18,000 भावी अभिभावक के तौर पर दर्ज हैं। जिसमें से करीबन 50 से 60 फीसदी अभिभावकों ने लड़कियों को गोद लेने की इच्छा जताई है। एक सेमिनार में उक्त जानकारी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री वीरेंद्र कुमार ने साझा की थी। उन्होंने बताया कि देश के लगभग 9000 चाइल्ड केयर इंस्टिट्यूशन्स को रेटिंग करने के अलावा राज्य की अडॉप्शन एजेंसियों की भी ग्रेडिंग किए जाने की एक प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जिससे बेहतर प्रदर्शन करने वाली एजेंसियों को पुरस्कृत किया जा सके। साथ ही इससे प्रदर्शन करने में नाकाम एजेंसियों की पहचान भी की जा सकेगी।
वैसे देखा जाय तो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कोई एक योजना नही है यह समय के मांग की जरूरत है। अगर समाज में बेटियों को भी उचित शिक्षा और सम्मान मिले तो कभी भी ये बेटिया भी किसी भी क्षेत्र में पीछे नही रहती है। इसलिए यदि यह कहा जाय की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना नही हम सबकी एक जिम्मेदारी है तो इसमें कोई गलत नही है। यदि हम सभी एक अच्छे समाज का निर्माण करना चाहते है तो हम सबका यही फर्ज बनता है हम इन बेटियों को भी पढाये। उन्हें इतना सशक्त बनाये की खुद गर्व से कह सके की देखो वह हमारी बेटी है जो इतना बड़ा काम कर रही है। वह खुद को गौरवान्वित करने वाली बात होंगी।

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