सर्वोच्च न्यायालय ने हर्ष वर्धन लोढ़ा की निदेशक के तौर पर पुर्ननियुक्ति के डिवीजन बेंच के आदेश को बनाए रखा

कोलकाता। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार 11 मई को तीन विशेष लीव याचिकाओं को खारिज कर दिया और कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पिछले सप्ताह दिए गए उस फैसले को बरकरार रखा गया था जिसमें हर्ष वर्धन लोढ़ा को उनकी अध्यक्षता वाली दो कंपनियों – विंध्या टेलीलिंक्स लिमिटेड और बिड़ला केबल लिमिटेड का निदेशक बनाए जाने की अनुमति प्रदान की गई थी। इस आदेश के तहत ही इन कंपनियों की पिछले साल हुई वार्षिक आम बैठकों में पारित प्रस्तावों को घोषित करने और उन्हें प्रभावी तौर पर अमल में लाए जाने का आदेश भी दिया गया था।
इस मामले के बारे में श्री लोढ़ा के लीगल काउंसल और साॅलिसिटर फर्म, फाॅक्स एंड मंडल में पार्टनर श्री देबंजन मंडल ने कहा कि “यह फैसला एक बड़ी जीत है, एक ही सप्ताह में ये दूसरी सफलता मिली है और उन लोगों के प्रयासों को झटका भी है जो कि लगातार इन कंपनियों के कामकाज को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। ये प्रयास भी विशेष तौर पर इन कंपनियों की वार्षिक आम बैठकों से ठीक पहले किए जा रहे हैं।”
दिवंगत प्रियंवदा देवी बिड़ला की अंतिम वसीयत के लिए अभियोग में प्रतिवादियों के माध्यम से बिड़लाज ने पिछले साल कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया था और इन तीन कंपनियों की वार्षिक आम सभाओं में हुए मतदान के परिणामों की घोषणा पर निषेधाज्ञा (स्टे) प्राप्त की थी। जिन प्रस्तावों को विवादित किया गया, उनमें श्री लोढ़ा को विंध्या टेलीलिंक्स और बिड़ला केबल में निदेशक के तौर पर फिर से नियुक्ति किए जाने का प्रस्ताव भी शामिल था। इसके साथ ही बिड़ला काॅर्पोरेशन के शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान भी रूकवा दिया गया।
श्री मंडल ने कहा कि “कलकत्ता उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने 4 मई को फैसला सुनाया था कि प्रियंवदा देवी बिड़ला की वसीयत पर विवाद की सुनवाई करने वाली प्रोबेट अदालत को पहले यह निर्धारित करना चाहिए था कि क्या इन कंपनियों के संचालन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार क्षेत्र है, और इसके साथ ही माननीय एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निषेधाज्ञा को खारिज कर दिया था।“ श्री मंडल ने कहा कि “हमारे क्लायंट ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि ये कंपनियां प्रियंवदा बिड़ला की वसीयत को लेकर जारी कानूनी लड़ाई में एक पक्ष के तौर पर शामिल नहीं हैं, जो 2004 से कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित है।“
सोमवार 11 मई को, डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखा गया था और इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। माननीय न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और माननीय न्यायमूर्ति एम. आर. शाह ने कहा कि डिवीजन बेंच के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था, और यह दोहराते हुए कि एकल-न्यायाधीश प्रोबेट अदालत को यह निर्धारित करना होगा कि पहले स्थान पर ये उसका अधिकार क्षेत्र है या नहीं।
पिछले हफ्ते डिवीजन बेंच के फैसले के बाद, बिड़ला केबल और विंध्या टेलीलिंक्स ने अलग-अलग विनियामक फाइलिंग में कहा था कि पिछले साल उनकी वार्षिक आम सभाओं में हुए मतदानों में, 99 प्रतिशत से अधिक वोट श्री लोढ़ा के निदेशक के रूप में दोबारा चुने जाने के पक्ष में थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ के अंतरिम आदेश द्वारा आयोजित सभी अन्य प्रस्तावों को भी उनके पक्ष में कम से कम 95 प्रतिशत मतों के साथ पारित किया गया, जो तीनों कंपनियों के अल्पसंख्यक शेयरधारकों में से प्रबंधन के लिए भारी समर्थन का संकेत देता है।
श्री मंडल ने कहा, “सोमवार के फैसले के साथ, इसे शीर्ष अदालत में सही तरीके से निपटाया गया है कि प्रोबेट कोर्ट द्वारा क्षेत्राधिकार के मुद्दे का फैसला किए बिना तीसरे पक्ष वाली कंपनियों के खिलाफ कोई भी आदेश जारी नहीं किया जा सकता है।“

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