राजस्थान की भाषा और साहित्य के अभिलेखन तथा भारतीय पुरातत्व में एल पी टेसिटोरी का अभूतपूर्व योगदान

नई दिल्ली । लुइगी पिओ टेसिटोरि का जीवन काल दुर्भाग्य से बहुत छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने छोटे से जीवन काल में ही पूरी कामयाबी हासिल कर ली। प्रमुख पत्रकार ओम थनवी के अनुसार, इटैलियन इंडोलोजिस्ट और भाषाविद् ने राजस्थान के लोक साहित्य पर काफी षोध किया और उन्होंने राजस्थान के लोक साहित्य से संबंधित आंकड़ों का संग्रह किया और कालीबंगन की सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
रजा फाउंडेशन की ओर से कला विषयक श्रृंखला के तहत आयोजित एक चर्चा में, अपने यात्रा वृतांतों, गंभीर निबंध और पर्यावरण कार्य के लिए प्रसिद्ध श्री थनवी ने टेसिटोरी की जीवनी ‘‘कालीबंगा का अन्वेशी’’ विषय पर चर्चा करते हुए टेसिटोरी की विद्वता के कई आयामों को सामने रखा।
इस शत स्वभाव वाले और ज्ञानी युवक के बारे में अधिक भारतीय को जानकारी नहीं है। इटली में छात्र जीवन के दौरान उनका भारतीय भाषाओं के प्रति गहरा लगाव उत्पन्न हुआ और वह 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत आये और 1919 में स्पैनिश इन्फ्लूएंजा की वजह से 32 साल की उम्र में अपनी असामयिक मृत्यु से पहले के सिर्फ पांच सालों में इंडोलॉजी में अकादमिक अनुसंधान में असाधारण योगदान दिया।
श्री थनवी ने बताया किया कि टेसिटोरी 1914 में इटली से भारत आये और उन्होंने संस्कृत, पाली और प्राकृत जैसी भारतीय भाषाओं में गहरी विद्वता हासिल की। उन्होंने फ्लोरेंस के यूनिवर्सिटी से मास्टर किया था। जॉर्ज ग्रिर्यसन (जिन्होंने भारतीय भाषा का सर्वेक्षण किया) के आमंत्रण पर, युवा इतालवी ने कोलकाता की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के स्कॉलर के रूप में जोधपुर और बीकानेर राज्यों के मौखिक और लिखित लेखों का दस्तावेजीकरण करने का महत्वाकांक्षी कार्यभार संभाला।
राजस्थान की भाट परंपराओं के बारे में टेसिटोरी के दक्षतापूर्ण अन्वेषण उनके द्वारा क्षेत्र के इतिहास के पुनर्निर्माण के विचार से प्रेरित थे। श्री थनवी ने कहा, ‘‘टेसिटोरी राजपूताना क्षेत्र में सिर्फ साढ़े पांच साल रहे। लेकिन इस छोटी सी अवधि में ही, राजस्थान के लोक साहित्य में इस्तेमाल होने वाली प्राचीन भाषाएं, डींगल और पिंगल के क्षेत्र में उनका कार्य अद्भुत था। उन्होंने क्षेत्र के दूरस्थ कोनों से कई लोक पांडुलिपियों को इकट्ठा करने और सत्यापित करने के लिए कड़ी मेहनत की।’’
इंडोलोजिस्ट टेसिटोरी अपने भाषाई अन्वेषण के क्रम में वह चारन शैली के एक महत्वपूर्ण लेखक पृथ्वी राज राठोड की कविता कृष्ण रुक्मिनी री वेली की समीक्षा की और उन्होंने अपने द्वारा संपादित एक विष्वसनीय संस्करण को तैयार किया। श्री थनवी ने कहा, ‘‘अपने व्याख्यात्मक लेखों में, टेसिटोरी ने पाया कि कृष्ण रूक्मिनी री वेली ने राजस्थानी साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण दर्जा हासिल कर लिया था।’’
श्री थनवी ने कहा, ‘‘यदि कोई इसके बारे में गंभीरता से सोचेगा तो वह यही पायेगा किटेसिटोरी ने ही सिंधु घाटी की एक सभ्यता, कालिबंगन की खोज की थी, भले ही वह निर्णायक निर्णय पर नहीं पहुंच पाए। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि इन प्राचीन टीलों में ‘यदि प्रागैतिहासिक पुरातनता नहीं है, तो भी ये बहुत पहले के अवशेष हैं।’’
टेसिटोरी के कार्य बधाई के पात्र हैं, जिनकी बदौलत हम कालिबंगन को सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख क्षेत्र के रूप में जान सके, जो कि अपने अद्वितीय अग्नि वेदी और दुनिया के सबसे जल्द पता चलने वाले कृषि योग्य जमीन के लिए जाना जाता है।

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